Friday, December 2, 2011

मीमांशा

समाज ,सभ्यता ,राजनिति
विज्ञान ,धर्म और समष्टि
राजनिति ,कूटनीति ,हितोपदेश ,
प्रकृति पुरुष में विभेद
      मीमांशा
आकांक्षा उपलब्द्धियो के आंकड़ें
  व्यक्ति के समाज के ,
सभ्यता के प्रस्थान से शीर्ष तक
स्वर  आरोह  अवरोह
वर्तमान के आईने में
यथार्थ जीवन अतीत के परिधान में लिपटी दुल्हन
वर्तमान की स्रष्टा
सर्जक
अंतहीन
उर्जा स्त्रोत की जनक
अखंड अजन्मा
जीवन
वह गया , यह आया
यही जीवन










साक्षात्कार

विचरों का गहन अँधेरा
बुद्धिबाद का अंत 
सत्य अपना अर्थ खोजता 
तिलष्मी का खोह 
व्यक्ति का व्यामोह 
अनुत्तरित प्रश्न 
जो समय के लबादे में खो गया है !!

Thursday, December 1, 2011

न खत्म होता समय

  1.  
     
    आओ की न ख़त्म होती तुम
     न खत्म होता मै
    ठहरो न खत्म होता समय
      न खत्म होते तुम
    न खत्म होती वेदना
     न खत्म होता समय
    हम रहे ना रहें
    नही खत्म होती संभवना 
     न खत्म होती अस्मिता
    तुम सृष्टि भी नहीं 
     तुम आकाश भी नहीं
    की तुम संभवना हो 
     जो कभी खत्म नही होती
    सत्य की तरह 
      जो कभी खत्म नहीं होती

सत्य

सत्य
  सत्य को संधान कर
  बीनता सत्य जीवन का
पग -पग पर यथार्थ के सत्य से संस्पर्शर्ण
     आकर्षण विकर्षण
  संधान क्रिया में अंधत्व की तरफ अग्रसर हू 
      मै प्रकाश की तलाश में
      अंधत्व से युद्ध के लिए तैयार
              शंखनाद
    अभी सीप से ही शंख हुआ हूँ
     उसमे हवा स्वर के लिए ठडा हूँ
   समुद्र के लहरों के विरुद्ध
   अपने सीपे में जीवन से युद्ध
   अनंत है समुद्र
  उसकी गहराई भी मेरी सीपे में मापी जा सकती है
  मैंने भी उसके पानी को उफान से पनाह दी है
   बार-बार वह क्रुद्ध हो मेरे अन्दर आता है
   अपना खारा पानी दे जाता है
   और मै इस सत्य को
  शंकर की तरह पी  जाता हूँ

नैतिक --------

मेरी अपनी व्यक्तिगत राय में .......केवल नैतिक मूल्यों से ही
पाशविक प्रब्रितियो पर नियंत्रण पाया जा सकता है ,आंतरिक अनुशासन से ही हम
समाज में अपना अस्तिव अक्षुण रख पा रहे है, अगर ऐसा न होता तो पाषाण युग से आज
तक की यात्रा,या यूँ कहे की होमोसेम्पियेस से चेतना स्तर को हमने विकसित किया
या प्रकृति के द्वारा हो गया कह नहीं सकता ! सब कुछ मानवीय अनुशासन से और
मानवीयता से निसृत है और यह सब हमारे अंदर संवेदनशीलता से आती है, और संवेदना
का विकास हमरे प्रबत्तियों से, और प्रबत्तियां हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से, और
सांस्क्रतिक मूल्य धर्म से ,और धर्म हमरी पद्यतियों से जीवन शौली से! रही कानून
व्यवस्था की बात, तो वो इसी अन्तर्द्वन्द की उपज है !व्यक्ति की पशुता को कानून
से नही दूर किया जा सकता ! एतिहासिक सांस्क्रतिक पृष्ठिभूमि का बिहंगम अवलोकन
आवश्यक है !कानून व्यक्ति के लिए होता है पशु के लिए नहीं, अगर व्यक्ति में
पशुता है तो देवत्व भी है! अभी कितने साल हुए गाँधी जी को हमसे अलग हुए जितने
भी महापुरुष हुए है, वे ऐसा सिर्फ अपनी प्रबल घनीभूत संवेदनशीलता एवं द्रष्टिकोण
व्यापकता की वजह से ही है .....................सादर

माँ

माँ
मेरी माँ के सफेद बालों में
कुछ काले भी हैं
जो अब सफेद होने को आतुर हैं
अब उसकी मांशपेशियां झूल रही हैं माथे पर अनुभवों की लकीरें
क्रमश उतर कर गालों
एवं हाथों तक आ गयी है
लकीरें कुछ समय पूर्व यात्रा कर थकी हैं
अभी भी आतुर है कुछ करने को
उसका निजी सामान सार्वजनिक सा है
मेरी माँ सार्वजनिक सार्वजनीन है
उसका सूप पर दानों को फटकना
चावल से खुद्दी का निकालना
सूप पर थाप दिए गाती है
राग भैरवी
चिड़ियों की चह छाह्त एवं उसका हंसना पृथक नही
उसकी फूली हुयी आँखों में सृष्टि समाया है
उसकी कानों ने सृर्फ़ गीत गुनगुनाया है
उसमें मैंने भी नहाया है
उसने मुझे बज्र भी सह लेने की ताकत दी है
सूप की थाप पर
मूसर की घन पर
दिखाया है पसीना
आंचल से पोंछती हुयी सिखाया है
मुझे कूट कूट कर बताया है
कभी न रोना ,कभी न रोना 
 
 
 

माँ

माँ
मेरी माँ के सफेद बालों में
कुछ काले भी हैं
जो अब सफेद होने को आतुर हैं
अब उसकी मांशपेशियां झूल रही हैं
माथे पर अनुभवों की लकीरें
क्रमश उतर कर गालों
एवं हाथों तक आ गयी है
लकीरें कुछ समय पूर्व यात्रा कर थकी हैं
अभी भी आतुर है कुछ करने को
उसका निजी सामान सार्वजनिक सा है
मेरी माँ सार्वजनिक सार्वजनीन है
उसका सूप पर दानों को फटकना
चावल से खुद्दी का निकालना
सूप पर थाप दिए गाती है
राग भैरवी
चिड़ियों की चह छाह्त एवं उसका हंसना पृथक नही
उसकी फूली हुयी आँखों में सृष्टि समाया है
उसकी कानों ने सृर्फ़ गीत गुनगुनाया है
उसमें मैंने भी नहाया है
उसने मुझे बज्र भी सह लेने की ताकत दी है
सूप की थाप पर
मूसर की घन पर
दिखाया है पसीना
आंचल से पोंछती हुयी सिखाया है
मुझे कूट कूट कर बताया है
कभी न रोना
कभी न रोना