Saturday, June 3, 2017

सांस्कृतिक अतिवाद


कोई भी पूर्वाग्रह पालना पाप है,हमारी संस्कृति इसे खारिज करती है अहिंसा भारतीय जन मन में रचा बसा है ! आखिर कांग्ररेसियों ने किसी समय गाय और बछडे के निशान पर सत्ता का सुख भोगने वाले के द्वारा केरल में खुले आम बछड़ों को काटना एवं गोमांस का वितरण करना उतना ही अपराध है जितना की गाय पर राजनीति करना ! नए राजनीतिक समीकरणों की खोज में अब गाय कुछ ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है ! गाय,गाय का गोबर,गोमूत्र उसके बछड़े,उसका पूरा परिवार चक्र, भारतीय जनमानस में रचा बसा है ! पशु और आदिम मानव का इतिहास बहुत पुराना है, खैर वार्तमान केंद्र सरकार ने पशु क्रूरता निवारण (पशु धन वजार) कानून 2017 को पारित किया यह कानून सर्वसम्मति से पास हो गया और प्रभावी भी है ( भारतीय मन हर प्रकार की क्रूरता एवं हिंसा का विरोधी है ) लेकिन प्रश्न यह उठता है इस तरह की क्रूरता का स्मरण हमें 2017 में ही क्यों आया ? जबकि संबिधान सभा में गोबध रोक पर बहस हुयी थी ! यह निर्विवाद सत्य है की संविधान  साभा के सभी सदस्य योग्य थे ! देश स्वतंत्र हुआ था ! तब स्वतंत्रता हमारे लिए अमूल्य निधि थी  इसीलिए भारतीय राजनीति देश निति थी ! आज की तरह मुद्दों का अविष्कार की मुहताज न थीं  ? प्रायोजित आविष्कारित मुद्दे जो राजनीति को शतरंज की तरह शह और मात के खेल से ज्यादा वैज्ञानिक थे ! तभी तो स्वतन्त्रता संग्राम के समय अग्रेजी पढने की होड़ सी लगी थी ! उस समय भी बेद मौन थे ! संबिधान वेदों की ऋचाओ से न निकल  कर अमेरिकी संविधान,यूनाईटेड किंगडम, आईरीस, जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ा था ! जो आज भी कायम है ! जैसा की लेखक ने उधृत किया है की सेठ गोबिंद दास ने गोबध निषेध को संस्स्कृतिक विषय बताया और बताया की गाय श्रीकृष्ण के समय से ही मत्वपूर्ण है ! शिब्बन लाल सक्सेना,ठाकुरदास भार्गव,राम नारायन सिंह,आदि आदि ने गोबंस को निषेध बताया,तत्कालीन संविधान सभा ने इस विषय को मौलिक अधीकारों में न रखते हुए राज्य के निति निदेशक तत्वों में रखा,निति  निदेशक तत्व वे आदर्श सूत्र वाक्य है जिन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है हां जब लोक कल्याणकारी सरकारे चाहें तो वे इस विषय पर कानून बना सकती है,अब  सवाल यह है की सरकारे गोबंस तक ही अपने आपको सिमित क्यों रख रही है?आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं की नीव अभी भर नहीं पायी है और हम गाय और मंदिर पर ही संकेद्रित क्यों हैं ? मै यह मानता हूँ की मंदिर हमारे आस्था के केंद्र है हमें अपने केंद्र से विचलित नहीं होना चाहिए ! क्या वैदिक युग का बोध संविधान सभा के सदस्यों में नहीं  था ? अगर नहीं था क्यों?ये वेद उस समय प्रसंगिक नहीं थे ? ! अगर भारत की  सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के तह में जाए तो हमें पता चलेगा की वैदिक धर्म के विरुद्ध ही बौद्ध धर्म का उदय हुआ था ! वैदिक धर्म जिस चश्मे से आज देखा जा रहा है समय के कोप से यह भी नहीं बच पाया था कारण एक ही था,कट्टरता ! सांस्कृतिक अतिवाद ! भारतीय धर्म एवं दर्शन अतिबाद से मुक्त रहा है इसकी तरलता ही 15000 वर्षों से आज तक भी अक्षुण है अत: तत्कालीन समय की आवश्यकता है मांग और आपूर्ति में उचित संतुलन बनाते हुए जनहित में कार्य किये जांय ! यहाँ यह कहना आवश्यक होगा कि नोटबंदी एक साहसिक निर्णय था जो किसी सरकार का ना तो मौलिक अधिकार था ना ही संविधान में इसका उदाहरण ही है पर हुआ ! पूरा देश एकता के सूत्र में बधा था लोग प्रतीक्षारत थे कि परिणाम सार्थक होंगे पर वही ढाक के तीन पात साबित हुए ? माननीय वित्त मंत्री जी के वयान पर गौर फरमाए तो पायेगे की मात्र 91 लाख लोग ही टैक्स के डायरे में आयेंगे और 12 लाख लोग चिन्हित किये जा रहे है ! जिस समय नोट्बंदी की घोषणा की गयी थी उस समय सरकारी आकड़ों के हिसाब से 18 लाख 50 हजार कर्रोड़ से अधिक रूपये 1000,एवं 500 रूपये के रूप में बाजार में उपलब्ध थे ! 131 करोड़ के भारतीय भूभाग में सिर्फ 4 करोड़ लोग टैक्सपेयर हों यह क्या आश्चर्यजनक नहीं ? क्या यह आश्चर्यजनक जनक नहीं  की १३१ करोड़ के भारत में सर कुल मिलाकर 4 करोड़ लोग इनकम टैक्स पेयी है ?  यहाँ यह ध्यान रखना होगा की प्रधानमन्त्री ने स्वयम स्वीकारा  की आखिर बड़े बड़े घर और बड़ी कारों की संख्या का अनुपात  लगाया जाय तो इनकम टैक्स पेयी की संख्या और बढ़ सकती है ! पर क्या हुआ ? अन्ना के आन्दोलन में वे ही लोग भ्रटाचार के विरुद्ध झंडा लिए खड़े थे जो भ्रष्टाचारी थे उस समय भी संसद मौन थी आज भी रेनकोट पर संसद मौन है ? 

Thursday, March 30, 2017

यात्रा




जब मेरी महासमाधि टूटी मैंने देखा मेरी माँ काफी बूढी हो चुकी थी झुर्रियों के बीच उसका दमकता चेहरा कालचक्र की भेट चड चुका था झूलते चमड़ों ने उसकी हड्डीयों को रोक रखा है बस बड़ी -बड़ी आखों से मैने जाना यह वही है जिसको मैंने बचपन में देखा था इसी ने बताया था ये तुम्हारे पिता है ! अब वह विधवा हो चुकी है,मै कुछ कहता उसने कहा,तुम इतने कमजोर क्यों हो गए ?जब तुम गये थे तब तुम्हारे बाल काले थे मुछे भी न उगी थी अरे यह क्या ? अब तुम बूढ़े हो गए ?यह सब कैसे हुआ ?यह क्या हो गया तुम्हे ?तुम एसे हो ही नहीं सकते ? बिस्फरित आखों से घूरती हुयी युवा हो चली थी, मैंने भी अतीत की आखों से देखा हम दोनों लगभग उस काल खंड में थे !मेरा मेरी माँ से मिलन काफी दिन बाद हुआ था इसलिए हम दोनों एक टक एक दुसरे के आखों में देखते हुए अतीत हो चले थे मुझे मेरा बचपन या यूँ कहें चेतना के स्तर पर जो कुछ भी था याद आने लगा मै कुछ भाउक हो रहा था उसने उसे मेरी भाव भंगिमा से पढ़ लिया था उसने मुझे बाताया पगले कहाँ खो गया ? मै तो नित्य हूँ ! तुम मुझे मेरी कृष काय से हतप्रभ हो ? मै तुम्हारे अचेतन चेतन में हूँ मैने तब भी अपने आपको विचलित नहीं होने दिया जब तुम्हारे पिता स्वर्गवासी हुये थे, जानते हो ? मैंने तुममे तुम्हारे पिता की छवि देखि थी मैंने हँसते हँसते ही वह बज्रपात भी सह लिया था यह कहते कहते वह रुक गई,उसका मुख मंण्डल देदीप्यमान हो रहा था जैसे वह पिताजी के साथ हो ! तुम नही जानते मेरे पिता ने मुझे जन्म देते समय यह बताया था कि तुम सरस्वती हो ! मै अकेले ही नहीं जन्मीं थी मेरे पिता ने मुझे बताया था कि तुम्हारी बहन लक्ष्मी,एवं दुर्गा भी थी !एक वहन मेरी विश्वदेव के साथ है और दूसरी रामदेव के साथ है उसका जैसा नाम था वह वैसी ही है मेरे माता पिता ने हम तीनो का नामकरण बहुत सोच समझ कर रखा था ! उसने आह भरते हुए कहते हुए कहा, सहस्त्रब्दियाँ बीत गयी मैंने कुछ दिन तुम्हारे पिता की प्रतीक्षा में विताये और अब तुम्हारी महासमाधि की जिद ? तुम दोनों ने मुझे खूब रुलाया है यह कहते कहते उसकी झूलती चमड़ियों से युद्ध करती उसकी आखों में आसूं आ गए और मैं आवाक बालक की भाँती चुप चाप सुन रहा हूँ जैसे उसने मेरे समय को तराजू पर तौल दिया हो ! मेरा ज्ञान भौचक्का स्वयम को घूर रहा है !इतने हक्के बक्के क्यों हो ? मैं तुम्हे समय के पलड़े में तौल नहीं रही !तुम्हे क्या लगता है बाल सफ़ेद होंने से लोग ग्यानी होते है ? नहीं यह तुम्हारा भ्रम है,मैं शांत भाव से उसकी बातो को सुन रहा हूँ, मैं कुछ कहता वह बोल पड़ी एक बीज से ही बृक्ष होता है और उसके पत्ते अनेक और यह अनेक पुनः एक हो जाता है ! मैंने कहा हाँ माँ तुम ठीक कहती हो ! तुम्हे याद है जब मैं तुम्हे आचार्य के पास भेजती थी तुम रास्ते से ही लौटना चाहते थे और मैं तुम्हे पुनः आचार्य के पास भेजती थी और तुम पुनः लौट आते थे याद है ? और लौटते समय मेरे आँचल में मेरे सीने से लग तुम मेरे आँचल को अपने मुह को ढक लेते थे याद है ? मैंने कहा हां माँ ! जानते हो मैं यह जानती थी की आचार्य की पढ़ाई हुयी हर बात से तुम्हारा प्रतिवाद था फिर भी मैं आचार्य के प्रति अनुशासन भाव हो इसलिए तुम्हे आचार्य के पास भेजती थी !हाँ माँ यह अनुशासन का भाव ही था, मैंने कठिनतम परिस्थियों में भी भिक्षाटन कर के भी क्षुधा तृप्ती की है ! तुमसे पाया प्रतिबाद ही मेरी शक्ति थी, मै अभिमन्यु की तरह युद्ध कर रहा था मेरे विरुद्ध सभी नीतिवान समय के सापेक्ष कतार में खड़े थे,मेरा हठ इतना उर्जावान था ? यह मै नहीं जानता ? पर वह कौन सी शक्ति थी जिसने मेरे प्रतिरोध में ऊर्जा भरी थी ! मै कह नहीं सकता अभी तुमने कहा था न एक ही अनेक है और अनेक ही एक यह बात मै सिर्फ समझा ही नहीं था इस पल एवं क्षण को जीया गया है ! जय पराजय से मुक्त तेरे दिए ज्ञान के दान के सहारे जीवन जी रहा हूँ !अभी मैं नितीवान होने का दम्भ ही भर रहा था उसने पूछा तुम कब से नीतिवान हुए ? इस यक्ष प्रश्न पर मैं मौन था ! उसने मेरे मस्तक पर उभरती लकीरों में आयी सिकुड़न को कुछ समझने का प्रयास ही कर रही थी मैंने निःस्वर हो कहा माँ तुमने ही तो बताया था कि जीव आहार,निद्रा,भय,मैथुन में रचा बसा है और तुमने ही बताया था कि हमारी पांच इंद्रिया है जिससे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष का अनुभव कर सकते हो क्या यह शिक्षा गलत थी ? सत्य के पक्ष में सिर्फ पाँच गाँव ही तो मांगे थे ? माँ मैंने जो गाँव मांगे थे वह क्या गलत था ? मेरे परमपिता ने उन्हें समझाया था इससे बाहर निकलो लेकिन वे नहीं माने वे मेरे पुरुषार्थ की प्रतीक्षा ले रहे थे और ले भी क्यों नहीं यह उनका बोध जो था !नीति और बोध की चर्चा पर स्वर्ण मुद्राये भारी पड़ी थी ! ये वही स्वर्ण मुद्राये थी जिसके मोह में मेरे प्रतिपक्षी खड़े थे और स्यात मैं भी ? हम दोनों ही की मांग में समानुपातिक अंतर था ! मैंने कब समस्त आर्यावर्त माँगा था ? मैंने तो एक टुकड़ा जिससे जीवन यापन हो जाय यही माँगा था ! मैं तो परिस्थिकीक संतुलन के हिसाब से मांग की थी लेकिन उन्होंने मेरी इस मांग को भी अस्वीकार्य किया था चूँकि मैं आहार, निद्रा, भय, मैथुन, में सना हुआ जीव था तो इन्द्रियों की मांग स्वाभाविक ही थी ! ऋतुओं से अप्रभावित मैं नहीं हो पाया था लेकिन ऋतुओं के प्रभाव में नियंत्रण आवश्य था ! क्रमश:

Sunday, June 12, 2016


प्रिय रविश जी,एन०डी० टीवी के वाचक एवं प्रिय धर्मेन्द्र जी,भारतीय पुलिस सेवा






प्रिय रविश जी एवं प्रिय धर्मेन्द्र जी,-धर्मेद्र जी आपके पत्र का प्रेषण,एक प्रतिउत्तर है, रविश जी कार्यपालिका और विधायिका दोनों के गठजोड़ का विश्लेषण कर रहे है,उनका विश्लेषण कई मायनों में सही भी हो सकता है,किन्तु संसोधनों के साथ,मुझे संसोधनों में यह लगता है,कि एक के पास सब कुछ कहने की स्वतंत्रता है विधि द्वारा स्थापित सीमाओं के साथ,तो दूसरे के साथ भी यह समस्या है,परिस्थितिया एक सी है,एक सिर्फ शब्दों से प्रहार करता हुआ दिखता है, तो दूसरा उन प्रक्षेपित प्रहारों को ठीक उसी दिसा में मोड़ता है,जिस दिशा से वे शब्द आये थे इन कलाबाजियों के मसीहागीरी में मै अपने शब्दों की कुछ कलाबाजी मै भी कर रहा हूँ,आप दोनों उस व्यवस्था को कोष रहे है,जिसमे आप और हम जी रहे है,हम सिर्फ संस्थाओं के प्रतिनिधि के रूप में शब्दों को अपने द्वारा बनायी हुयी प्रत्यंचा से प्रक्षेपित कर रहे है,यह प्रत्यंचा बनायी ही क्यूं ? यह प्रत्यंचा इसलिए बनाई कि इस शस्त्र से हमारा पेट भरे,भरे हुए पेट से निकले शब्द बाण इसी तरह से निकलते है, एवं इसी तरह से प्रति उत्तरित होतें है,साहित्य के लालित्य में खो जाने वाले यह शब्द पत्र ही मूल समस्या है,हम अच्छे या तुम अच्छे,इस क्रिया में जो नहीं हो पा रहा वह यह है, कि हम और तुम से बाहर निकलते हुए, हमने कभी सोचा की यह शब्द किन तक संप्रेषित हो रहे है ? और किसके लिए हो रहे है,शायद नहीं, शायद कारण यह है कि रविश जी गाँव को छोड़ अब दिल्ली में आ चुके है,अब वे दिल्ली के किसी शानदार फलैट से चमचमाती रोशनी से नहाये पूरी दिल्ली देख रहे है जो भारत है,और वहीँ से शाश्वत विश्लेषण की प्रक्रिया में संधान की मुद्रा में है,तो आप अभी एसी से निकलते हुए बर्दी पहने हुए नीली बत्ती से सवार हो अभी घटना क्रम को देख आये संवेदना के त्रास से आहत है,दोनों की स्थितिया बदल चूँकि है,आप जब पड़ रहे थे तो मुक्तिबोध को पढ़ना आपकी मज़बूरी थी, क्योंकि वही मुक्तिबोध आपके भविष्य के सम्वाहक थे,मुक्तिबोध की आवश्यकता भी यही तक थी कि आप उस मानसिकता में जीते हुए आप मुक्तिबोध को कैसे छोड़े,आपने मुक्तिबोध से मुक्ति पा कर नीली बत्ती पा ली, और रविश जी ने उस गाँव की अनुभूति को छोड़ उन अनुभूतिक शब्दों को कैश कराने लगे,अगर रविश जी उसी गाँव की स्टूडियो से बोलते उनकी आवाज न आप सुनते न हम सुनते,लगभग पूरे भारत की यही स्थिति है,मै भी आप दोनों की कतार में खडा वह व्यक्ति हूँ जो अभी तक अपने शब्दों को कैश नहीं सका है, अक्षम है,अंदर से मै भी चाहता था, कि आप दोनों की भूमिका मिले व्यक्तित्व को दोष दें,या परिस्थतियों के आयोजन में त्रुटी,परिस्थितिया आप जैसी नहीं बना पाया, या मुझे रास नहीं आया?अब नहीं मिला तो आप अपने पास दोनों तर्क रख सकते है..१९४७ से पहले के लोंगों का भारत और उसके बाद के भारत में बहुत अंतर आ गया है,ध्यान रखे यह मै लखनऊ से देख रहा हूँ,हम शब्दों के नेपथ्य में जो है,वह होकर जब सोचेंगे तब वह किसी संस्था का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे होंगे, तब हम भारत के लोंगों का प्रतिनिधायन कर रहे होंगे,रविश जी आपने अपने पत्र में यह स्वीकारा है की आप रट्टा मारने कम दिल्चपसी रखते थे,सही तो यह आप रट्टा मार ही नहीं सकते थे,और भाई धर्मेद्र जी,साहित्य की साधना की जो आयोजित साधना थी कि और परिणाम स्वरूप नीली बत्ती पा ली,दिल्ली में इनका सिविल सर्विस आफिसर्स इन्सीटयूट है,कभी जाय, देखे कितना भव्य बना है, कितना सुखद है, मैंने देखा है, यह सौभाग्य बस ही प्राप्त हो पाया, मेरे एक दूर के रेस्त्तेदार है जो इनकी श्रेणी में आते थे,शायद वहां इसलिए लिवा जाते थे आप अपनी औकात का मापन और परिक्षण करें ?मुझे रात से क्या शनक सबार है की बीना प्रतिउत्तर के सांस लेना मुश्किल है,आप दोनों लोग हमें अपनी औकात न दिखाए,मै एक सुधारक को खोज रहा हूँ, एक इमानदार व्यक्ति को खोज रहा हूँ, जिस दिन वह मिल जाएगा तब हम भारत के लोंग अपनी प्रत्यंचा से शब्द बाण नहीं कर्मरत भारत देखेंगे,हम भी अब्दुल कलाम की तरह सपने देख रहे है और उसे पाने की प्रक्रिया में संधानरत है,एक कविता जिसको मैंने 1990 में लिखी थी,जो प्रासंगित दिखती है आज के परिपेक्ष्य में 

''विचारों का गहन अन्धेरा! 
 बुद्धिबाद का अंत 
 सत्य अपना अर्थ खोजता 
 तिलष्मी का खोह 
 व्यक्ति का व्यामोह 
 अनुत्रित प्रश्न 
 जो समय के लबादे में खो गया है,,   


भवदीय 
रवि शंकर पाण्डेय

Tuesday, June 7, 2016


पितृपक्ष




ये मेरे पिता जी ! 
कभी मार्गदर्शक के रूप में, 
कभी वर्जनाओं में 
कभी नियमों में आबद्ध 
कभी दिखे प्रतिबद्ध
मेरी हितबद्धता से आबद्ध 
एक साँचें में ढालते हुए 
अपने को खोते हुए 
मुझमे स्वयं को खोजते हुए 
कभी नियमों को तोड़ा 
कभी सिद्धांतों को छोडा
खुद के कसम कश करते हुए 
जीवन के भ्रम को जानते हुए भी 
जीवन भ्रमण करते रहे 
मुझमें स्वयं को देखते रहे 
आशा की कल्पना की उड़ान भरते हुए 
आज ग्रहों नक्षत्रों की कक्षा से मुझे 
आदेश देतें है 
और मै अनुशासित भाव से 
अपने संतति को वह भाव सम्प्रेषित कर 
उनका वैचारिक विसर्जन करता हूँ!