Thursday, August 1, 2019

दुआर -दलान और ड्राइंग रूम

उन्नीस का पहाड़ा आज तक नही याद हो सका गुणा -गणित में कमजोर,कितने कीचड़ों,बीहड़ो,से दो चार होते गांव के मेड से ना जाने कहाँ - कहाँ भटकते-भटकते जीवन के रास्ते पर चल ही रहा था,हर रास्ते पर कुछ दूर चलते चौराहे मिल जाते थे न कोई लक्ष्य था न कोई मंजिल ही थी,इसी बीच कुछ ने इस दुनियां से ही विदा ले ली।खैर यात्रा का प्रारम्भ होगा तो समाप्ति भी होगी यह सबके साथ होता चला आया है सो कोई नई बात नही है।कुछ लोंगों का समय उकड़ूँ वैठा था तो कुछ अर्जुन की तरह मछली का आंख देख स्वयम्बर भी रचा लिये।तो कुछ सूत पुत्र हो कर्ण हो गए।सबका चयन अपना -अपना था।कुछ ने रति का साथ नही छोड़ा तो कुछ के लिए रति भष्मीभूत काम को पुनर्जीवित करने के यत्न में जुटे थे,कुछ को शिखंडी होना पड़ा तो कुछ जन्मजात थे,रूप और यौवन से मत्त मेनका ने विश्वामित्र को तीसरे जगत के निर्माण से रोका था।कुछ पुत्र इतने आज्ञाकारी थे कि उन्होंने अपना यौवन ही अपने पिता को दे कर संतुष्टि पाई और पिता रंगमहल में अपने बच्चे को जीर्ण होते देख यौवन की मादकता से ऊब कर यौवन लौटाया था।अंततः यथार्थ को भी दया आ गई थी।समय के चौराहों ने कितनों के चेतन -अचेतन को प्रभावित किया था।चेतन-अचेतन की वह अंधी दौड़ जो कभी स्कूल में खेल-खेल में खेले थे।अब खुली आँखों से अंधी दौड़ की तैयारी हो ही रही थी कि किसी ने आंख की पट्टी को खोला था।अब बाधारहित दौड़ की बारी थी सो आंख की पट्टी खोल दी गयी थी।इस भाग दौड़ में कुछ ने नंगी आखों की दौड़ लगाई तो तो कुछ ने गांधारी की तरह आंख पर पट्टी बांध ली।स्त्रीलिंग,पुलिंग,उभयलिंगीयों के व्याकरण को ठीक से समझ भी नही पाया था पंडीजी ने तत्सम,तद्भव,उपमा,अविधा,लक्षणा,व्यंजना,तक पढ़ाते-पढ़ाते कब रस की निष्पत्ति हो गईं यह कहाँ पता चलता है।अभी तो पालने के पूत की तरह कुछ हाथ-पैर मारता कुछ दूर ही चला था कि किसी ने जोर से आवाज लगाया क्या करते हो भाई,कमसे कम वह ब्रूटस तो नही था।कालीदास की तरह पेड़ काटते काटते एक ब्रह्म दो हो गया दो का एक ब्रह्म कब हो गया यह ध्यान ही न रहा।यह सब दुआर को छोड़ने का नतीजा था।जब आदमी अपना दुआर छोड़ता है तो ठीक दूसरे दुआर के कुत्ते जैसा हाल होता है।इसकी अलग त्रासदी है तो मजे भी अलग हैं।दूसरे दुआर के कुत्तों से साहचर्य बढ़ना।साहचर्य और सौहार्द को खोजता निकलता अभी आगे ही बढ़ा था कि अखाड़े के पहलवान ऐसी लंगी मारी की चारो खाने चित्त हो गया।अखाड़े में लंगी की वेईमानी पुरष्कृत हो चुकी थी।हारे हुए जुवारी की तरह सर को नीचे झुकाए दुनियां के सर्कस में जोकर हो गया।भूमिकाओं और भागिमाओं का जीवन मे कितना महत्व होता है यह समझते समझते इतनी देर हो गयी थी जैसे अंग्रेजी का ट्रांसलेशन के पाठ को पढ़ाते हुए पंडीजी ने मुझे पूछा था कि मेरे आने से पहले गाड़ी छूट चुकी थी और मैं उसका अंग्रेजी में अनुवाद न कर पाया था।जीवन मे अनुवाद न करने की गलती से मौलश्री की छाया छुटी और किसी का सैल्यूट आजीवन किताबों में बंद हो गया।जन्म के समय पाया कवच कुंडल कितने दिन काम आता।दया से दैन्य होता कब किसको क्या दे दिया ?कब किसने कितना लिया ? यह कहां कोई भूलता है।उधार की नांव पर सवार अभी पानी की धार को देख ही रहा था कि हवा पछुवाँ वह गयी,मल्लाह अभी नांव की कुंडी को सीधा कर ही रहा था कि हवा के ववण्डर ने नांव के पाल को ही उड़ा ले के चल पड़ी।एकोहम द्वितियों नास्ति की सारी परिभाषा ही बदल गयी।राम नाम सत्य है कहते -कहते नांव किनारे चुपचाप खडा हो यात्रियों की उतरने की प्रतीक्षा ही कर रहा था किसी ने पीछे से आवाज लगाई क्या करते हो भाई?मुझे ठेलते वह आगे बढ गया।अभी वो आगे बढ़कर पूछ ही रहा था कि कितनी नावों में कितनी बार ?घाट-घाट का पानी कोस कोस की भाषा को अभी कोस ही रहा था तब तक पैर के अगूंठे में उडुक लग चुका था खून से लतफत अंगूठे के नाखून को जोर से आंख मूँदते हुए खिंच ही रहा था कि किसी ने शवासन की मुद्रा बताई और यह भी बताया कि जीवन के लिए यह मुफीद होता है।इसी मुफीद दवा को हांथ में लिए -लिए साहित्य हो गया।आदिकाल,मध्यकाल,आधुनिक काल से होता हुआ प्लेटो से कार्ल मार्क्स हो गया इधर कुछ प्रेमचंद और गोर्की बनने की तैयारी चल ही रही थी कि छायावाद और अंधायुग शुरू हो चुका था।नॉका विहार कहा कर पाया था कि कामायनी ने सारे सर्गों की याद दिला दी थी।इसी सर्गो में विचरण करते राम की शक्तिपूजा की याद हो आई थी।रामचन्द्र शुक्ल की तरह टी.एस.इलियट को अभी कहा पढ़ पाया था तब तक भाषावैज्ञानिकों की टुकड़ी शंखनाद करते हुए स्नायु तंत्र पर ही टूट पड़े थे।अब उन्हें शरीर से कोई खतरा न था शब्दों को ढाल बनाये तलवारें भांज ही रहे थे तब तक कलिकाल का प्रभाव उनके धर दस्तक दे चुका था और लिखा जा रहा था ''अंधेर नगरी चौपट राजा।टका से भाजी टका सेर खाझा।।हा खाझा से ननिहाल की याद आ आई जहां की सीता जी थी वही मेरा ननिहाल भी है।सो उनकी त्रासदी को मैं कैसे भूल सकता था,प्राक्कथन में दोहराता बुदबुदाता रावण को अट्ट -सट बोलता,मर्यादा को कैसे तोड़ता?प्रश्नवाचक चिन्हों के बीच समय वक्र हो चला था,1857 में मंगल पांडे ने जो गोली मारी की धुंआ आज तक उठा ही रह गया,नव्वे बर्षों के अथक परिश्रम के बाद राम राज्य आ ही गया था।1947 में झंडा फहराया गया था। ऐसा किताबों में पढ़ा था,संविधान लिख उठा था।हम भारत के लोग ही प्रस्तावक व प्रस्तावना थे इसमे न जाने कब कौन प्रस्तावक बन बैठा कुछ याद नही।शक्तियों के विभाजन में कब कौन शक्तिशाली होता रहा पता ही न चला,नून,तेल,लकड़ी,में कहाँ कुछ बुझाता है भाई ।

Tuesday, July 30, 2019

बोध 1

बोध 1
आप सब मे ऊर्जा का अजश्र स्त्रोत है,क्योंकि चेतना अपने आप मे पूर्ण है,पूर्ण से पूर्ण को अगर निकाला जाएगा तो वह पूर्ण ही बचेगा,हां यह बात अलग है आपमें जिस ऊर्जा का संचरण हो रहा है उसका विस्फोट आप ही कर रहे है या यह वह है,जो आपके अन्तःक्रियाओं के परिणाम है?या प्रतिक्रिया स्वरूप आप एक अभिनव,सकरात्मक ऊर्जा का निर्माण करते चल रहै है?यहां यह ध्यातव्य हो कि जो भी सकरात्मकता एवम नाकारत्मकता है वह हमारे-आपके द्वारा विभाजित रेखा है जिसके इस पार से उस पार तक पूरा जगत है।हम उसी जगत की बात कर रहे है जहां प्रतिस्पर्धा,द्वेष,ईर्ष्या,है तो ठीक इसके विपरीत करुणा,दया,ममता का समानांतर अजस्र स्त्रोत भी है जो अपनी स्वाभाविता में गतिशील है।बस्तुतः ये जगत के वे उत्पाद है जिसके रचयिता व संघारक हमीं आप है । हमने ही जीवन को जटिल-सरल किया हुआ है।जटिलता जगत का गुण नही।जब आप जगत को संवेदनशील हो देखते है तो जो दृष्टि उभरती है वह आपकी हमारी एक जैसी ही होती है क्योंकि हमारा जीव विज्ञान,रसायन विज्ञान,भौतिक विज्ञान, मानव विज्ञान,साहित्य एक ही है विश्व के जितने ज्ञान की विधाएं है सब एक जैसी ही है अतः हमारा सबका आभ्यांतरिक जगत एक जैसा ही है।सामाजिक परिवेश,परिवारिक परिवेश,सांस्कृतिक परिवेश हमारी निर्लिप्त चेतना में संलिप्तता लाते है यह संलिप्तता ही निर्लिप्तता से पृथक करती है यह कभी भाषा के रूप में,कभी विचारों के रूप में पृथक -पृथक हो कर पूर्वाग्रहों आग्रहों का निर्माण कराते है।अचेतन मन इन पूर्वाग्रहों एवम आग्रहों की अत्यंत झीनी विभाजक रेखा को देख नही पाता फिर या तो वह आग्रही हो जाता है या वह पूर्वाग्रही हो जाता है।आइए चेतना के पूर्वाग्रह और उसके आग्रह को देखते है।एक पारिवारिक इकाई के रूप में जब हमारे ऊपर विचारों की श्रृंखला को संप्रेषित किया जाता है तब हम नही जानते की वह जीवन का आग्रह है या हमारे अंदर पूर्वाग्रहों की एक लंबी श्रृंखला बनाई जा रही है।हम उसी भांति जीवन को आचरित करना शुरू कर देते है।नदियों को प्रणाम,धरती को प्रणाम बृक्षों को प्रणाम चराचर जगत को प्रणाम करते है जिससे आवश्यक रूप से बिनीत भाव उपजता है और बिनीत भाव से हम अपने आंतरिक जगत के सौंदर्य को बाह्य जगत में देखना शुरू कर देते है तब वह हमारे धार्मिक,रीति,रिवाजों की अहम अभिव्यक्ति होती है।व्यक्तिगत सौंदर्य का हम जब विस्तार करते है वह वैभिन्नईक समाजों से होता हुआ गोचर होता है,ज्यों ही इसको पसारना शुरू करते है तत्क्षण अहमतियों- सहमतियों का जन्म शुरू हो जाता है सारा सौहार्द बोध ग्रसित हो अपनी समस्त ऊर्जा को या तो असहमतियों को समहत करने में या सहमतियों की युक्तिसंगतता देखने मे क्षरित हो जाता है यही से भगौलिक वटवारा,संप्रभुता,युद्ध,जैसी स्थितियां बननी शुरू हो जाती है,और हम विरोधाभाषी हो एक चेहरे में कई चेहरे लगाना शुरू कर देते है और जगत के सौंदर्य से बंचित हो जाते है यह सौंदर्य की त्यक्तता हमे रिक्त करती चलती है और हम एकांगी होना या उसके प्रतिपादक या अग्रदूत होने की अनावश्यक प्रतिस्पर्धा के पात्र होना शुरू करते है यह हमारा आग्रह भी होता है और पूर्वाग्रह भी।सहमति और सहजता से च्युत तब हम अधिनायक होते है तब हमें रंगों में भेद दिखाई देने लगता है तब कोई कुरुप होता है तब कोई सुदर्शन होता है।तब सभी पर्यायवाची न होकर विलोम हो जाते है । हमने जितने अनुलोम विलोम बनाये है हम उसी अनुलोम- विलोम में पूरा जीवन खपा देते है और यही से हमारे बोध का क्षरण आरम्भ होता है अतः इन उच्चावच्चों में यह देखना होगा कि सम्यक का संकुल किधर है ।

दुआर - दलान और ड्राइंग रूम

दुआर - दलान और ड्राइंग रूम
मैं अपने पिताजी के घुटने के बराबर ही था पर उनके जैसा बनने,बड़ा हो जाना चाहता था अब मेरे चाहने से पूरी पृथ्वी अपनी कक्षा में पचास वर्ष एक ही बार मे घूम तो नही जाती पर मैं चाहता था कि वह घूम जाय और मैं पिताजी जैसा बन जाऊं,पर ऐसा होता कहाँ है ? से अनिभिज्ञ अपने बड़े होने की प्रतीक्षा करता रहता,अन्य भाई बहन जिनके हाथ पैर लंबे होते जाहिर है उनका कपड़ा भी बड़ा होता था । सबके सब आदेश की मुद्रा में मुझे अनुशासन का पाठ पढ़ाते बड़े हो रहे थे और मैं आज्ञापालक की भूमिका में विनम्र रहता क्योंकि थप्पड़ से चोट बहुत तेज लगती यह बात अलग है कि जब मैं फुक्कारे मार जोर - जोर से रोता मेरी बड़ी बहन जिसने एकाध तप्पड़ रसीद किया होता था वे गुड़ भी खिलाती थी जिसको माँ न जाने कहाँ - कहां रखती थी । उसका डिब्बा कभी खाली नही रहता था,मुझे उस डिब्बे की ज्यों ही महक लगती उसका कुछ गुड़ उदरस्थ हो गया रहता सो स्थान बदलती रहती मैं अपना मन बदलता रहता वह छिपाती और मैं खोजता रहता कभी कभी मुझे लगता था कि वह छिपाती ही इसीलिए थी मैं खोज लूँ । लुका छिपी के इस खेल मैं लगभग पारंगत था,इस विशिष्ट कौशल का विकास उसकी सदाशयता ही थी दांत पिसती,डांटती वह कब बूढ़ी हो गयी और मैं युवा इसका पता ही न चला,पर उसकी हनक के हुंकार से मैं आजीवन सहमा रहा कभी हिम्मत न पड़ी की उसके सामने तेज से कुछ बोल पाऊं । उसके स्वर की कडुआहट में उतना ही गुड़ रहता था जितना कि उसके प्यार में,जिसको मैं कभी उसकी गोद मे बैठ उसके दूध पीने के लिए नाटक करता, यह नाटक इसलिए भी करता क्योंकि उसकी गोद मे जब भी मैं होता आँचल से मेरा सिर ढ़ंक कर दूध पिलाती और मेरे सर को सहलाये जाती अपने जन्धे को बार बार फैलाती की मैं उसमे समा जाऊं और मैं जगह घेरता जाता आकार के अनुरूप उसकी गोद में भर जाता था यह सिलसिला कभी पाँच मिनट का होता या मैं छोड़ता ही न था । कंठ में जो भी बूंद गए उसने इस शरीर मे इतना बड़ा घर बनाया की मैं आज तक निवृत्त न हो पाया । ऐसा नही है कि मैं निवृत्त होना चाहता हूं क्योंकि उसकी स्मृतियों से निवृत्त होना मेरे अस्तित्व से निवृत्ति है अतः वह मुझमे है और मैं उसमे हूँ । अब पिता जी !! मेरे पिताजी की कद काठी सामान्य थी उनके साथ जानवरों को चारा ले आने जाते समय मैं उनके कदमों को देखता जूते की तलवे की छाप वरसात के दिनों में स्पस्ट दिखयी पड़ जाता था उनके जूते के तलवे की लकीरों से जो बोध उपजा वे इस पृथ्वी के सम्राट से कम न थे और मैं  स्वयम्भू राजकुमार । वे अक्सर राजनीतिक धार्मिक दार्शनिक व्यख्या किया करते थे जबकि वे अपने जीवन मे कम पढ़ने को लेकर मर्माहत भी रहते थे । शायद यह मर्म ही रहा होगा कि वे महाराज दशरथ न बन पाए न ही मैं राम,लक्ष्मण,भरत, शत्रुघ्न्, वे जुलाई 1924 में पैदा  हुए थे,स्वतंत्रता संघर्ष भी देखा था,वे घोषित स्वतंत्रता सेनानी तो नही थे लेकिन इस मातृभूमि के सच्चे भक्त थे,इस देशभक्ति का जीता जागता उदाहरण मैं बना तमाम प्रकार की संपत्तियों से बंचित उत्तराधिकारी के रूप में मुझे वैसुधैव कुटुम्बकम ही मिला और अब तक मैं उनकी इस धरोहर को सुरक्षित रखा हूँ ।
क्रमशः

Saturday, July 27, 2019

ठूँठ का ऊँट

ठूँठ का ऊँट
बहुत कुछ आपको पढ़ना नही होता,वह तो आपके अन्तर्जगत में समाहित है,हां कभी -कभी उस पट को झांक अवश्य लिया करे ,जहां तक आपने देखा है,उसके उस पार का जगत भी ऐसा ही है,जैसा आपने देख छोड़ा है,जब आप किसी सजीव को देख रहे होते है,उसके लिए आपको कोई साहित्य या पुस्तक पढ़नी नही पड़ती,आपके अंदर का साहित्य,इतिहास,अर्थशात्र,दर्शनशात्र,भूगोल,भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान,जीव विज्ञान,मानव विज्ञान, संस्कार,धृणा,प्रेम,अनुकूल - प्रतिकूल अक्षरों के रूप में वाक्य के समूहों में उद्घाटित होने लगते हैं।आपके अंदर का तमस - उमस के साथ वाहर निकलने लगता है और आप उसे व्याकरण के धागे में पिरोते हुए किसी के गर्दन में उस शब्दों की माला को डालकर प्रतीत की अनुभूति को प्राप्त होते है,हां यहां यह ध्यान रखना होगा कि प्रतीति का भी संवेदी सूचकांक होता है बस यहीं-कहीं,किसी को प्रतीति में संभावना दिखती है तो किसी में वह चक्रवात की तरह आलोड़न कर देती है या प्रतीति अपना अर्थ ही खो देती है । खैर संवेदना कोई ठोस बस्तु नही वह द्रव होता है जो स्वयम में गतिशलता लिए कभी सीधे तो कभी चौतरफा पानी के बेग को  धरती में फटे दरार को तृप्त कर देती है,यह प्रक्रिया कभी मद्धिम तो कभी-कभी तीव्र होती ही रहती है । मद्धिम और तीव्र होते उसके गुण रैखिक नही होते वे छैतिज भी नही होते है।रैखिक और छैतिज के बीच मे आप कभी जीवन के चतुष्कोण बनाते व्यास को अपने प्रक्रार से मापना शुरू कर देते है क्योंकि इनकोणों में ही या तो आप व्यस्त है याआपके द्वारा खींची गई रेखा आपकी भंगिमा है तो भागिमाओं को पढ़िए जो आपके मूल उतपत्ति में है जो आपको विश्राम देती है,विश्राम से गोचर होती भंगिमाओं को आप उसके इर्द - गिर्द ही देख पाएंगे,क्योंकि जहां से आप इन चीजों को देख रहे है  वह निराधार नही वह आपके अस्तित्व के आधार होते है,तो जिसका जो आधार हो उसका वह ही निष्कर्ष भी होता है तो निष्कर्णात्मकता की दृष्टि भी  वायवीय ही जानिए, वायवीय होने के अपने खतरे है तो अवायवीय के भी अपने खतरे कम नही हैं अतः वायवीय होते चित्त को देखिए और यह भी देखिए कि वह ज्यामितीय कोण बना पाते है या नही ? अगर कोई आकृति नही बन पाती है तो भिन्न भिन्न कोणों के बीच स्वयम को देखें,आप यहीं कहीं किसी व्यास या कोण के आधार को लम्बवत या  दंडवत करते देखे जाएंगे ।

दुआर - दलान और ड्राइंग रूम

मैं अपने पिताजी के घुटने के बराबर ही था पर उनके जैसा बनने,बड़ा हो जाना चाहता था अब मेरे चाहने से पूरी पृथ्वी अपनी कक्षा में पचास वर्ष एक ही बार मे घूम तो नही जाती पर मैं चाहता था कि वह घूम जाय और मैं पिताजी जैसा बन जाऊं,पर ऐसा होता कहाँ है ? से अनिभिज्ञ अपने बड़े होने की प्रतीक्षा करता रहता,अन्य भाई बहन जिनके हाथ पैर लंबे होते जाहिर है उनका कपड़ा भी बड़ा होता था । सबके सब आदेश की मुद्रा में मुझे अनुशासन का पाठ पढ़ाते बड़े हो रहे थे और मैं आज्ञापालक की भूमिका में विनम्र रहता क्योंकि थप्पड़ से चोट बहुत तेज लगती यह बात अलग है कि जब मैं फुक्कारे मार जोर - जोर से रोता मेरी बड़ी बहन जिसने एकाध तप्पड़ रसीद किया होता था वे गुड़ भी खिलाती थी जिसको माँ न जाने कहाँ - कहां रखती थी । उसका डिब्बा कभी खाली नही रहता था,मुझे उस डिब्बे की ज्यों ही महक लगती उसका कुछ गुड़ उदरस्थ हो गया रहता सो स्थान बदलती रहती मैं अपना मन बदलता रहता वह छिपाती और मैं खोजता रहता कभी कभी मुझे लगता था कि वह छिपाती ही इसीलिए थी मैं खोज लूँ । लुका छिपी के इस खेल मैं लगभग पारंगत था,इस विशिष्ट कौशल का विकास उसकी सदाशयता ही थी दांत पिसती,डांटती वह कब बूढ़ी हो गयी और मैं युवा इसका पता ही न चला,पर उसकी हनक के हुंकार से मैं आजीवन सहमा रहा कभी हिम्मत न पड़ी की उसके सामने तेज से कुछ बोल पाऊं । उसके स्वर की कडुआहट में उतना ही गुड़ रहता था जितना कि उसके प्यार में,जिसको मैं कभी उसकी गोद मे बैठ उसके दूध पीने के लिए नाटक करता, यह नाटक इसलिए भी करता क्योंकि उसकी गोद मे जब भी मैं होता आँचल से मेरा सिर ढ़ंक कर दूध पिलाती और मेरे सर को सहलाये जाती अपने जन्धे को बार बार फैलाती की मैं उसमे समा जाऊं और मैं जगह घेरता जाता आकार के अनुरूप उसकी गोद में भर जाता था यह सिलसिला कभी पाँच मिनट का होता या मैं छोड़ता ही न था । कंठ में जो भी बूंद गए उसने इस शरीर मे इतना बड़ा घर बनाया की मैं आज तक निवृत्त न हो पाया । ऐसा नही है कि मैं निवृत्त होना चाहता हूं क्योंकि उसकी स्मृतियों से निवृत्त होना मेरे अस्तित्व से निवृत्ति है अतः वह मुझमे है और मैं उसमे हूँ । अब पिता जी !! मेरे पिताजी की कद काठी सामान्य थी उनके साथ जानवरों को चारा ले आने जाते समय मैं उनके कदमों को देखता जूते की तलवे की छाप वरसात के दिनों में स्पस्ट दिखयी पड़ जाता था उनके जूते के तलवे की लकीरों से मुझे वे इस पृथ्वी के सम्राट से कम न थे और मैं  स्वयम्भू राजकुमार । वे अक्सर राजनीतिक धार्मिक दार्शनिक व्यख्या किया करते थे जबकि वे अपने जीवन मे कम पढ़ने को लेकर मर्माहत भी रहते थे । शायद यह मर्म ही रहा होगा कि वे महाराज दशरथ न बन पाए न ही मैं राम,लक्ष्मण,भरत, शत्रुघ्न्, वे जुलाई 1924 में पैदा  हुए थे,स्वतंत्रता संघर्ष भी देखा था,वे घोषित स्वतंत्रता सेनानी तो नही थे लेकिन इस मातृभूमि के सच्चे भक्त थे,इस देशभक्ति का जीता जागता उदाहरण मैं बना तमाम प्रकार की संपत्तियों से बंचित उत्तराधिकारी के रूप में मुझे वैसुधैव कुटुम्बकम ही मिला और अब तक मैं उनकी इस धरोहर को सुरक्षित रखा हूँ ।
क्रमशः 

Monday, July 22, 2019

फिलॉसफी


मेरे गाँव मे एक निहायत सज्जन व्यक्ति थे वे दर्शनशात्र से एम.ए. थे ! यह घटना 1978 की होगी,आटा पिसाने के लिए पचास किलो का बोरा ले के जब चक्की पर जाते तो वह चक्की वाला  भी उनका गेहूं पीसने में हिला हवाली करता ! उस चक्की पीसने वाले का बेटा भी आई. टी. आई. फिटर ट्रेड से पास करके उस समय नया -नया रेलवे में नॉकरी में लगा था,उसके पिता को यह बड़ा नागवार लगता कि उसके पड़ोसी के बड़े भाई के बेटे ने एम.ए. कैसे कर लिया ! उस जमाने मे एम.ए. कोई - कोई होता था ! वैसे उन्होंने दर्शनशात्र क्या पढ लिया विचारे पर आफत आ गयी,जहाँ भी जाते लोग बाग उनका मजाक उड़ाने से नही चूकते थे,कारण था कि बहुत उनके साथ पढ़े लोग दारोगा हो गए,बहुत लोग चपरासी भी हो गए,अन्यान्य पदों पर,पर उनकी कहीं नॉकरी नही लगी,वैसे भी उन दिनों अभिभावकों में इतना धैर्य कहां होता था, एक सीमा के बाद बच्चो को पढाये,एम.ए. थे ही,तो गांव लोग उन्हें पंडीजी कहना शुरू कर  दिए, कहीं किसी के दरवाजे पर शादी विवाह में जाते तो उन्हें देखकर लोग अपने बगल वाले से धीरे से कहते,देखिए अपने बच्चे को फिलॉसफी कभी मत पढाईयेगा,मैने इनके बाप से कहा था सब पढा लीजिए पर फिलॉसफी मत पढ़ाएगा अब भोगे ससुर, यहां से पंडीजी का परिचय दे दिया जाता था ! फिर उनको यह कह कर बुलाया जाता कि  ए पंडीजी जरा यहां आइए,पंडीजी किसी कहने पर चले जाते,तब उनसे मुखातिब हो पूछते क्यों  मिठाई मिली ? वे संकोची स्वभाव के थे सहज ही बच्चों की तरह कह देते न अभी तो नही मिली, लेकिन आप परेशान न हो मिठाई का क्या है मिल ही जाएगी जिन्होंने उनका परिचय कराया होता था वह बड़े ही जिज्ञाषा भरी नजर से दोनों आंख को बाहर करते हुए उकड़ू हो पूछते अरे पूरा जवार मिठाई खा गया अभी ये लोग आपको मिठाई ही नही दिए ? इस प्रश्नवाचक चिन्ह में उनका हास परिहास होता था,जैसे उन्हें कोई समय पास करने के लिए कोई लड्डू मिल गया हो ! राह चलते हर चलाने वाला भी कह लेता था कि आपकी पढ़ाई दो कौड़ी की है आप हर भी नही चला सकते ! मैने आपके बाप से कहा था कि अंगूठा टेक निमन है पर फिलॉसफी पढ़ाना तो बच्चे को पागल कर देता है ! आपको नही पता होगा जब हम बच्चे थे तो हमारे जमाने मे भी एक जने एम.ए. किये थे,वो तो इतना पढ़े की पगला ही गए,तब हमने उनको बताया था कि कानू ओझा के यहां ले जाइए इसका दिमाग सनक गया है,मेरी बात मान कर वो कानू के यहां गए और उस ओझा ने ऐसी मिर्चे की धुंवे की सुघनी सुघाई की वह एकदम मुठ पकड़ कर हर जोतने लगे, आप भी एक दिन अपने पिता जी को ले के जाईये हर चलाना सिख जाएंगे,उन्होंने उनकी सलाह ली और आगे बढ़े ! संयोग से एक दिन मेरे भी सर पर बीस किलो का गेहूं का बोरा था,कपार का बोझा क्या होता है उस दिन पता चला तीनों त्रिलोक चौदह भुवन दिख रहे थे,किसी तरह गिरते पड़ते मैं भी चक्की की तरफ बढ़ा,हमसे पहले वे पहुंच चुके थे,मैं उनके ठीक पीछे था,वरसात का दिन था एक प्लास्टिक का बोरा ओढ़े वे आगे -आगे मैं पीछे -पीछे ! मेरे लिए वह बोझा पृथ्वी का बोझ था झट से उतार पैक मैने कहा पंडीजी जरा गमछा दीजिये,पंडीजी ने झट से गमछा दे कहा आप तो बहुत छोटे है फिर भी ? लाद लिया लोंगों ने ?जी मैने कहा,अरे अब  जब गेहूं पिसाना हो,तो मेरे घर आ जाना,मैं तुम्हारे घर का गेहूं पिसवा दिया करूँगा,अभी वे बात ही कर रहे थे कि चक्की वाले ने कहा,हे पंडीजी,आपका गेहूं 49 किलो है, पंडीजी गमछे से मुँह पोछते हुए बोले, ना काका घर से तो जोख कर पचास किलो ही मिला है,कहीं आपके बटखरे में तो दिक्कत नही है ? तुम फिलॉसफी क्या पढ़ लिए ! हाफ माइंड हो गये हो ?मैं कक्षा आठ में नया -नया गया था,मुझे हाफमाइंड कुछ अटपटा लगा उस समय तक हाफ माइंड का मतलब समझ में आ गया था ! मैने धीरे से कहा कि एक किलो के बटखरे के साथ आपने तौल दिया है चाचा ! वे थोड़ा सकपकाए,पता नही क्या सोचकर उन्होंने ने मेरी बात मान ली ! अब उनका गेंहू पचास किलो हो गया था,मैं भी हवाई चप्पल को हाथ मे उठाये प्लास्टिक की पन्नी ओढ़ कीचड़ में आगे बढ ही रहा था पंडीजी ने आवाज लगाई रुकिए हम भी चलते है रास्ते मे पानी के बरसने से कीचड़ बहुत हो गया है कही आप गिर न जायँ ! मैं मना करता रहा लेकिन वे नही माने,मेरे पीछे - पीछे ठीक,से खांच बा, दिखाते -दिखाते मेरे घर के मोड़ पर आकर बोले, अब इधर पक्का है,आप जा सकते है ! मैने बड़े ही संकोच में उनसे कहा भाईया आप पिलासफी से एम.ए. क्यों किये ? उन्होंने मेरे मनोभाव को भाफते हुए कहा, जीवन की गुणा गणित में मैं फेल था राजनीति मुझे आती न थी जब गणित ही नही आई तो अर्थशात्र को कैसे पढ़ पाता विज्ञान को मैने भौतिकता से जोड़ कर देखा,अब क्या करता ले दे कर फिलासफी ही बची थी और मजे की बात यह थी वह विषय मुझे अच्छा भी लगता था सो पूरा बावन परसेंट नम्बर से पास हुआ था,लेकिन क्या करता ? नॉकरी नही लगी,और सच बताता हूँ मैंने भी नॉकरी को जीवन का जंजाल ही समझा ! अभी उनकी बात खत्म भी न हुई थी कि मैंने पूछा कि भाईया लोग आपका मजाक उड़ाते है,वे कुछ गम्भीर हो गए, अंधेरा होने को था पानी बरसना फिर शुरू होने ही वाला था उन्होंने कहा ''वे लोग नही जानते मैं उनको वेवकूफ समझता हूं और वे मुझे "मेरे लिए यह एक ऐसा प्रश्नचिन्ह था जिसका सटीक उत्तर आज तक नही खोज पाया और अपने घर आ गया ! अगले हफ्ते इसका अगला भाग !

प्रतिरोध,चुप्पी - संतुलन

प्रतिरोध,चुप्पी और संतुलन
आप यह ध्यान रखें कि वृहत्तर सामाजिक संगठन में परस्पर विरोधाभाषी समाज रहता है ! जो देखने मे तो एक वृहत्तर समाज दिखता है लेकिन इसकी  प्रवृत्तियों में एक तरफ प्रतिरोध है तो दूसरी तरफ चुप्पी तो तीसरा वह जो उस समाज का अधिष्ठाता मानव है, जो अक्सर चुप्पी साधे रहता है ! यह चुप्पी उसके स्वार्थी और परमार्थी होने का सममुच्चय है ! यह चुप्पी उसकी अनुकूलता की चुप्पी है,जब उसकी अनूकूलता - प्रतिकूलता में बदलती है तो प्रतिरोध का जन्म होता है ! बस्तुतः प्रतिरोध भी स्वयम की अनूकूलता में प्रतिकूलता द्वारा खलल डालना है ! प्रतिरोध का स्वर तीक्ष्णता से ओतप्रोत होता है,यह तीक्ष्णता अपनी  दृष्टिबोध से ध्वंसात्मक है जिसमे मनुष्य की समस्त ऊर्जा के संकेन्द्रण में वह मनुष्य न रहकर नाभिकीय विखंडन की वह प्रक्रिया हो जाता है जिसमे उसका मूल उत्स होता ही नही ! मनुष्य एक शांत, कोमल,सहस्तित्ववादी होता है जिसमे अनुराग, प्रेम, करुणा, की अजश्र धारा बहती है जो प्रवाहमान है ! अतः वह उस मूल उत्स से ध्वंसात्मक प्रवृत्ति की तरफ नही जाना चाहता,क्योंकि उसकी सारभौमिक सर्वस्वीकारोक्ति ही प्रेम, दया, ममता, करुणा से आप्लावित है ! वह अपने मूल उत्स के आस्वादन में इतना तन्मय होता है कि वह अपनी तन्मयता को भंग नही करना चाहता और वह उसमें खो जाना चाहता है ! अनुराग द्वेष के परस्पर विरोधाभाषी संगठकों से उसकी एकाग्रता भंग होती है अतः वह जिस सुरक्षात्मक परिवेश का सृजन करता चलता है उससे उसकी आंतरिक तृप्ति में वह चुप्पी साध लेता है,यह चुप्पी उसके सहअस्तित्व को अक्षुण रखने हेतु सम्बल होती है ! आलम्बन की आड़ लेता मनुष्य संतुलन चाहता है ! व्यक्तित्व में आलम्बन का होना उसके आप्त का संवल है, आप्त की उतपत्ति संतुलन को जन्म देती है ! इस तरह मानव मन आप्त और उत्स की परिधि में वैचारिक संतुलन बनाता है ! यह संतुलन इसलिए भी होता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक प्राणी होने के नाते उसके कुछ अंतरंग अनुबंध है जिन अनुबंधों में जीना उसके मूल उत्स की अनिवार्यता भी है अतः वह प्रतिरोध में भी चुप्पी को सम्बल बना संतुलन में व्यस्त हो जाता है और उसका प्रतिरोध चुप्पी में परिवर्तित हो जाता है !