Sunday, November 17, 2019

दिनमान 90

दिनमान 90
आज लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकार भाईयों का दिवस है।भारतीय गणराज्य का यह वह लोकतंत्र है जहाँ के पत्रकारों को कोई सुविधा नही है।घुट-घुट के पत्रकारिता करते यह इस गणराज्य का वह लोकतांत्रिक स्तम्भ है जहां इनकी आर्थिक सुरक्षा,बीमारी,अस्पताल,बस,रेल,हवाई जहाज,सूचना प्राप्त करने,साहब लोंगों से कुछ पूछ लेने का कोई अधिकार नही है।जिन लोंगों को यह सुविधा प्राप्त है वे दिल्ली स्टेट गेस्ट हाउस के वे पांच सितारा अब के जमाने मे दस सितारा होटल के मेहमान होते है जिनके लिए गाड़ी व ड्राइवर की गाड़ी खड़ी रहती है।अब पत्रकार कारपोरेट व सरकार के बीच सेतु का काम कर रहे है।इस समय कारपोरेट पत्रकार जहां एक तरफ मोटी तनख्वाह पा रहे है।तो नए-नए पत्रकार डंडे की मार या मुकदमे के डर से  नही लिख रहे है।अब हर पत्रकार कहां से कोई मीडिया हाउस खोल सकता है?शुक्र है एक रविश कुमार जो ट्रोल हुआ है और इन्ही के पत्रकार मित्र उसको ट्रोल करते रहे हैं।जब आम जनता उसके साथ खड़ी हुई है तो हालात कुछ सामान्य हुए है।हमारे गांव के कई बच्चे पत्रकार है।मेरे गांव के एक पत्रकार भाई ने मुझे बताया था कि किसी जमाने में मजीठिया आयोग बना था।जो पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा और पत्रकारों को कर्मचारियों की तरह से सेवा सम्बन्धी कुछ प्रस्ताव सुझाये थे,मजीठिया आयोग की संस्तुतियों व उसके अनुपालन के लिए एक निर्णय मा0उच्चतम न्यायालय ने पत्रकारों के पक्ष में आदेश भी दिया था।लेकिन यहां के कारपोरेट को बीस प्रतिशत का लाभ नही चाहिए?यहां के कारपोरेट भी अस्सी प्रतिशत फायदे के चक्कर मे मानवता को बेंच दे रहे है।पूंजीपतियों की संख्या कम है,और श्रमिक ज्यादा हो गए है,तो मजदूरी का रेट पर अगर पेट पर काम हो जाय,तो इससे ज्यादा अच्छा क्या रहेगा?यही भारतीय पूंजीपति हैं और यही इनकी मानवता है।इन पूंजीपतियों को यह नही समझ आता है यही वो श्रम है जो पूंजी में रूपांतरित होती है जिससे उनकी पूंजी की आभा है तो लक्ष्मी की आभा को तिजोरी में रखकर चैन से सो रहे है।सुप्रीम कोर्ट और कानून इनके घर पानी भरता है।मेरे पास आंकड़ा नही है ना ही मा0 उच्चतम न्यायालय का आदेश है ना ही इन पत्रकारों में इतनी हिम्मत ही है कि वे जहां काम कर रहे है उनके खिलाफ संवैधानिक अधिकार मांग सके?पत्रकार को क्या कोर्ट भोजन कराएगा?ये लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ चुप-चाप अखबार मालिकों की जी हूजीरी कर रहे है।क्योंकि खाने पीने की व्यवस्था इन्ही अखबार मालिकों के भरोसे चल रहा है।अगर अवमानना बाद दायर कर दे तो नॉकरी चली जायेगी।ऐसे तो एक टाइम का भोजन भी सुरक्षित है न?तो मा0 पत्रकार महोदय लोंगों से निवेदन है कि अपने लिए अपने देश के लिए पीत पत्रकारिता छोड़कर अपनी आंतों में थोड़ी हवा भरे वह हवा सीने तक आ जायेगी कुछ अपने व अपने बच्चो की हक की लड़ाई लड़ ले।हमलोग तो वकील लोग है,हमको व जज साहब को तो ऋषि मुनि हो जाना चाहिए न?हमारे न घर होते है?न ही हमारी बीबी होती है न बच्चे होते है?पहले हम स्वतन्त्रता के आंदोलन के नेतृत्व करने वाले हुआ करते थे तो आजकल गुंडे हो गए है।तो आप जैसा कर रहे है वैसा ही भर भी रहे है।आप पढ़े-लिखे लोग जब वकीलों और काले कोट को गुंडे बदमाश कहेंगे तो क्या होगा?चार पायों पर खड़ा लोकतंत्र जब आपस मे ही अलोकतांत्रिक होगा तो लोकतंत्र का क्या होगा?आपलोग ज्यादा समझदार है यह हम कहां नही मानते कि आपने जो विद्वान कह-कर हमारा मजाक उड़ाया है वह आपने लोकतंत्र के लिए अच्छा किया है?हमलोगों को तो जनता की नजर में आपने धो ही दिया है।लेकिन हम वो नही जो आप सोचते है।हम तो वही सोचते है जो संविधान की प्रस्तावना सोचती है।इसीलिए हम खुद के बारे में कम हम भारत के लोंगों के बारे में ज्यादा सोचते है।यह हम वकीलों की एक ऐब है हम ऐबी जो ठहरे?हम वकीलों का क्या है?पाकिट में अठन्नी न हो पर क्लास वन आफिसर है।गाहे वेगाहे इस अकड़ से हमारे जज साहब भी परेशान रहते है।इसीलिए बहुत लोग ला करते-करते जज हो जाते है।कुछ जो इस वकालत पेशे में है वे भी जज भी  बन जाते है।फिर वे ही ला ग्रेजुयट जज साहब,वकील साहब को सब्जी बेचने से लेकर जेल भेज देने की धमकी देते रहते है।इसीलिए इस स्तम्भ का भी पाया हिल ही रहा है।वो हम वकील हैं कि अपनी टांग अड़ाए है तो न्यायपालिका का विशाल न्यायतंत्र खडा है।वह चाहे नायब तहसीलदार साहब की कोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट हो?आपलोग ही वे सजग प्रहरी है जिनकी सूचना पर सरकारों का भविष्य तय होता है।हम कानून के जादूगर है तो आप आंकड़ों के जादूगर है।हमारी जादूगीरी संविधान सम्मत है तो आपकी जादूगीरी शब्दों की जादूगीरी है।बता दीजिए जीडीपी दस प्रतिशत है।हम कैसे नही मान लेंगे?मानना पड़ेगा ही।वैसे ही जैसे दरोगा जी की प्रथम सूचना रिपोर्ट है कि अदालत में जिरह करते रहिए एक बार दरोगा जी चाह जाय तो जेल तो पक्का है।यह इसलिए आज नहीं लिख रहा हूं यह न जाने कब का पक्का हो चला है कि नॉकरशाह पुलीस व नेता जी का गठजोड है।इस पर भी सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है।अगर वह सरकार इम्प्लीमेंट कर देगी तो लोकतंत्र नही आ जायेगा?तो हमारे आपसे सबसे बनी जो सरकार है वही दोषी है?तो उसके घर लिए चलता हूँ।आईये नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से इंडियागेट चलते है।यहां अमर जवान की जो ज्योति जल रही है इसकी अनवरत लौ में लोकतंत्र दिख जाएगा।वो देखिए अमर जवान ज्योति से विजय चौक राष्ट्रपति भवन है उसके ठीक बगल में संसद भवन है जो इस देश की सबसे बड़ी पंचायत का भवन है।जहां से 136 करोड़ लोंगों का भविष्य संवरता है।यही से भारत रत्न सहित अनेकों पुरुस्कार मिलते है।यही वह लुटियन जॉन है जहां पहुंचने के बाद सबकी लुटिया डूब जाती है।जिसकी इस लूटीयन जॉन में लुटिया डुबी तो वह लुटिया भर लेता है तो जिसने लोटा डालके निकाला तो उतना पानी निकलता है।कुछ लोग बाल्टी ब तमलेट ले के जाते है और सात पुश्तों के लिए ऐसा पानी निकालते है कि 72 साल से पानी ही निकल ही रहे है।सुना है लुटियन जॉन में पानी व हवा की दिक्कत हो गयी है?तो हम भारत के लोग एक दूसरे से मिल कर क्यों नही रह रहे है?कोई नेहरू को गाली दे रहा है कोईं किसी को गाली दे रहा है।इस जॉन में शब्दों की मर्यादा लोंगों ने खो दी है।जब सबने घर फूक तमाशा देखने की ठान ही ली है तो आइए फिर भोगते है।मीठा-मीठा गप्प-गप्प तो कड़वा-कड़वा थू-थू क्यों भाई?बदलिए।बदलने से सब बदल जाता है।जब आप और हम बदल जाएंगे तब जव मीठा खाने का मन होगा मीठा खायेंगे और जब कड़वा खाने का मन होगा मिर्च डाल के कड़वा कर लेंगे।पहले जब सुगर के रोग का जमाना नही था तो लोग खूब गुड़ खाये है।तो देखिए विचारिये पत्रा खोलकर पंडीजी विना पैसा के सब बता दे रहे है फिर यह मत कहिएगा की पंडीजी ने बताया नही था।अब हम पत्रा बन्द करते है आपलोग भी फालतू की चीजों को बंद करे।'''संघे शक्ति कलियुगे""हम भारतीय  संघ को कह रहे है इससे आर एस एस का कोई लेना देना नही है।

आप सभी पत्रकार भाईयों को लोकतंत्र के पत्रकारिता दिवस की बधाई।अभी भी आपलोग बहुत अच्छा कर रहे है अच्छा करने का प्रयास करते रहिए हम सब साथ-साथ है। मित्रों को अभिवादन

Saturday, November 16, 2019

चाचा नेहरू को समर्पित

दिनमान 88 यह नेहरू को समर्पित है
ये भारत है !यहां हीरे,जवाहरात के तख्तताऊस पर न जाने कितने पैदा हुए और चले गए।कोहिनूर हीरा यहीं का है।हीरे में भी हीरे की खोज करने वाला भारत न सिर्फ कोहिनूर है,बल्कि वह नूर है जिसकी इबादत से पूरी कायनात जवां है।यह कोटि-कोटि ब्रह्मांडों का वह देश है जिसे किसी जामाने में आर्यवर्त कहा जाता था।तब इस भूभाग में रहने वाले सभी आर्य थे।आचार्य से आर्य समझे।यह वह भूभाग है जहां छह ऋतुओं का अनवरत कालचक्र चलता रहता है।जो विश्व के अन्य भूभागों में दुर्लभ है।भारत का वह भू भाग गांगा बेसीन का भूभाग है जिसने अपने तटीय क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपजाऊ व समतल जमीन व अपने निवासियों की विशाल जनसंख्या दी है।जिनकी सुवह जै राम जी से शुरू होता हुआ जै सियाराम तक होती है।उत्तर की उर्वरता में न जाने कितने देवता पैदा हुए तो उत्तर से दक्षिण को विभाजित करती विंध्य पर्वतमाला की बड़ी-बड़ी चोटियां है जिसको दक्षिण भारत का इलाका कहा जाता है।यह भारत माँ का वह बक्सा है जहां धर्म है,दर्शन है,आचार्य हैं।जहां बेद हैं श्रुतियाँ है,असंख्य बन है।कावेरी बेसीन का बहुत बड़ा भाग भारत की अविरल संस्कृति की सरिता है पूरब से पश्चिम,उत्तर से दक्षिण तक विस्तार है।जहाँ वेद लिखे गए हों जिसकी ऊँचाई ज्ञान की अंतिम उचाई है,जहाँ ऋग्वेद इस देश का चिंतन है तो यजुर्वेद यहां के निवासियों के लिये बनस्पतियों में जीवन देता हो तो सामवेद ध्वनि की ध्वन्यात्मकता में प्रभाव डालता है जो जीवन की सलिल सरिता है,अथर्वेद,अर्थों के अर्थ बताता है।भारत को देवभूमि भी कहा जाता है।जानते है क्यों?यहां राम,कृष्ण,व संत ही संत हुए है।विश्व का नक्शा उठाएं टापूओं पर बसे देश मिलेंगे।वह चाहे ग्रेट ब्रिटेन हो या अमरीका हो,फांस हो,जर्मनी हो।यहाँ का सर्वश्रेष्ठ मूर्ख भी उतना ही ज्ञान रखता है जितना कि ज्ञानी जन।जानते है क्यों?यहां की संस्कृति में सहअस्तित्व नाम का जो निच्छल भाव है वह इस देश के  मान को बढाता है।निच्छल शब्द से जो भाव उगता है वह उलीचने का भाव है उलीच देना का मतलब कुछ दे देना वह चाहे आशीर्वाद हो या इस देश का भूभाग हो।इसने विश्व को सिर्फ दिया ही दिया है।यह देश यहां के शासकों को सिर्फ देता ही रहता है यह लेता कुछ नही सब कुछ दे देता है।तो आप भी लीजिये दो अंजुरी गंगा जल न सही तो विलुप्त होती सरस्वती को ले सकते है।लेने के लिए झुकना पड़ता है और यहां के लोंगों ने झुक-झुक के बहुत कुछ लिया है।तभी किसी को बहुत कुछ दिया है।लेना और देना इस देश की विशेषता रही है।किसी देश का नागरिक जितना पढ़ के नही जान पायेगा।यहां का नागरिक मौखिक रूप से उतना अपनी जीवन शैली से जान जाता है।इस देश ने आक्रांताओं को भी उतना ही दिया है जितना इस देश के नागरिकों को दिया है।आक्रांताओं ने उसका सदुपयोग किया और शासन किया तो यहां के नागरिकों ने विगत चालीस वर्षों से जो उत्पात मचाया है कि यह फिर उसी ढर्रे पर निकल पड़ा है जिसे हम मध्यकाल मे छोड़ आये थे।जब कई सौ वर्षों तक लगातार पढ़ते रहेंगे और यहां के पुरातात्विक खोंजे करते रहेंगे तो सब कुछ सप्रमाण सब मिलते जायेंगे।यह विश्व की सबसे उन्नत सभ्यताओं में से एक है।इसका मतलब यह नही है कि सभ्यता के नाम पर आप हिटलर हो जाय?इसदेश के जनमानस में हिटलर कभी न पूज्य रहा है न रहेगा।इस देश ने पूरे विश्व को धर्म,जीवन दर्शन,व अविरल संस्कृति दी है।अगर हमारा इतिहास सौ पचास वर्ष का होता तो खसरा खतियान निकालता। यह कई हजार वर्षों की कहानी है तो कहाँ से खसरा व खतियान निकालूं?जिसके पास रुपया है वह सुदूर पूरब से सूदूर पश्चिम,व सूदूर उत्तर से सूदूर दक्षिण तक की यात्रा कर के देख ले।यहाँ की पुरातात्विक थातियों में वही सारे विश्व के खसरे व खतियान मिल जायेंगे।1857 से जब हम भारत के लोगों ने अपना खसरा व खतियान देखना शुरू किया तब जाकर नब्बे वरष के सतत संघर्षो,वलीदानों के बाद विश्व ने हमे 1947 में हमारा खसरा व खतियान दिया।उसमे जिन्ना की जिद ने पाकिस्तान बनवाया।वह इस देश का वह आवारा विगडैल बेटा है जो रोज-रोज अपने बाप से झगड़ा-रगड़ा करता रहता है।उसकी वेवकूफी से अफगानिस्तान और हमारे अफगानी भाई हमसे बिछड़ गए(सीमांत गांधी वही के थे)मुझे ऐसा लगता है वह फिर मिलेगा गलती सुधारेगा।सबकुछ होते हुए हम जानते है क्यों कुछ नही है?आपस की फूट यही आपसी फूट रही है जो हमें देवता से दानव बनाई है? जिसका इतिहास एक हजार ईसवी के बाद आता है।आज जब हम पुनः इक्कीसवीं सदी में है तो हमे अतीत से कुछ सबक लेना चाहिए।अनेकता में एकता जो 1947 में भगत सिंह,बोस,आजाद,गांधी नेहरू पटेल ने दिया,वह अगर विना मतभेद के रख सके तो रखे।यही से वह सब मिलेगा जो अभी तक नही प्राप्त हो सका है।अतः अपने पूर्वजों को न सिर्फ पढ़े ही उनके आचरण को अपने आचरण में ढाले यही अपने पुरखों के प्रति सच्ची श्रद्धाजंलि होगी।आईये हम गांधी,सुभाष,नेहरु भगत सिंह हो जाय।ज्यों ही आप एक हुए यह देश आपको इतना दे देगा कि आने वाली संतति आपको शब्दाजंलि देने से पहले शब्दकोश देखेगी की उस व्यक्तित्व के लिए कौन से शब्द पुष्प ठीक होंगे।तो निवेदन है शब्दों के ऐसे पुष्प बनाइये जिससे सबका पेट भरे,हर बेरोजगार हाथ को काम मीले,सब प्रसन्न हो सब सुखि हों।इसीलिए माहापुरुषों ने कहा है '' सर्वे  भवन्ति सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः,आज नेहरू जी का जन्म दिन है वे आधुनिक भारत के नीव थे।नीव दिखती नही वह पृथ्वी में दब जाती है।अतः नीव को और मजबूत करें उनकी स्मृति में पुनः हम अनेकता में एकता को बनाये रखे यही उनके जन्म दिन को मनाने की सार्थकता होगी।अन्यथा समय निकलता जाता है देश चलता जाता है।निकलते हुए समय को तो हम नही पकड़ पाएंगे पर अगर विना किसी भेदभाव के सबका सम्मान व हर हाँथ को काम देते जाएंगे तो वह दिन दूर नही जब हम पुनः मानवतावाद के अग्रदूत बन विश्व शांति का पाठ पढ़ाएंगे।

आप सभी के अंदर बैठे आदिदेव को प्रणाम।उस महान सपूत को प्रणाम जो कभी इस देश का लाल था।ऐसे लाल के जवाहर को शत-शत प्रणाम ।

वशिष्ठ नारायण सिंह

दिनमान 89 वशिष्ठ नारायण सिंह
महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का सस्वर शरीर नस्वरता को प्राप्त हो गया।अपने विद्यार्थी जीवन मे वे गणित विषय के विशेषज्ञता के लिये जाने गए।इससे पृथक जो गणित से हटकर जीवन था वह कुछ नही था।वह तो वह शरीर था जो उपयोगिता व ह्रास के नियम से आवद्ध है।उनके शारीरिक संगठन मे वह मष्तिष्क था जो गणित के अलावां कुछ नही था।उनको गंभीर मानसिक विमारी थी जो उनके मृत्यु तक साथ रही,उनकी असली मित्र भी वह बीमारी ही थी जो उनके जीवन में प्रसिद्ध गतितज्ञ होने के साथ तक रही।आज जब मैं लिख रहा हूँ तो सिर्फ उनकी विशेषता या उस गणीतिय प्रभाव से मुक्त नही हूँ कि वे प्रसिद्ध गणितज्ञ थे।मैं सिर्फ अपनी कलम इसलिए चला रहा हूँ कि वे गणितज्ञ थे,अगर मैं उनका पुत्र होता तो शायद उनको कोसता की क्या जरूरत थी ऐसी पढाई की जिसने जीवन को जीवन की तरह जीने ही न दिया?तो मेरा स्वयम का उत्तर भी यही होता कि यह उनका दुर्भाग्य था या जीवन का सौभाग्य की गहन विक्षिप्तता की अवस्था में भी उनके प्रशंसकों की कोई कमी नही है।यही तो जीवन है जो मरने के तत्काल बाद लोकमानस में जिंदा हो जाता है,इसीलिये वह जीवन जीत जाता है और मृत्यु हार जाती है।कहने वाले तो यहां तक कहते है कि जब तक आप मरेंगे नही तब तक आपको नर्क क्या स्वर्ग में भी जगह न मिलेगी?यह सही है कि मरना पड़ेगा तभी आपको या हमको नर्क या स्वर्ग मिलेगा।तो कब मरे ?इस सोच में बहुत लोग जिये जा रहे है।तो कुछ लोग मर-मर के जी रहे है?कि पता नही स्वर्ग व नर्क होता भी है या नही,चलो जी लेते है।जीने में भी हाच-पाच है कि मरे या जीये?मृत्यु क्या है?अगर व्यक्ति स्वस्थ है उसे शारीरक कष्ट नही है तो मृत्यु से साक्षात्कार करता हुआ मर जाता है,वह यह देखते हुए मर जाता है कि अब उसके स्वर के स्पंदनहींन हो रहे है और वह जब निस्पंद जब स्थगित हो जाता है फिर उस व्यक्ति की न कोई कल्पना होती है न कोई स्मृति होती है।वह निश्चेत होते-होते मर जाता है।निश्चेतना ही मृत्यु है।मृत्यु के बाद शनै: शनै: उसका शरीर नष्ट होना शुरू करता है।हमारी फिजियोलॉजी इस तरह की होती है अगर सक्रिय कोशिकाएं निष्क्रिय हुई तो वह सड़ने लगती है।अगर उसे उसी तरह छोड़ दिया जाय तो उसकी शारीरिक क्रिया के प्रतिक्रियाहीन होने की वह वजह है।जहां सूर्य की ऊष्मा उसे अवशोषित करती चलती है तो हवा उस ताप के अवशोषण को और हवा देती है।हाड़ मांस का शरीर क्रमशः गलना शुरू कर देता है व उसका सातत्य उसके शरीर को नष्ट कर देता है।फिर न उसकी कोई आकृति ही रहती है न उसकी सर्जना ही वह अतीत का वह भाग हो जाता है जैसे बीता हुआ कल हो।जैसे आपको याद है जब आप प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे तो आपका रूप रंग कैसा था?और आज कैसे है?तो क्या बदलती हुई शारीरिक अवस्था आपकी मृत्यु नही?यह बदलता चलता है और आपको पता भी नही चलता।इसकी प्रक्रिया इतनी धीमी-धीमी गति से होती है कि आप उससे अनजान ही जीवन को जी रहे होते है।वह जो आपका अतीत मरा है उसका अहसास है आपको है?नही।यही जीवन की तिलष्मी है कि जो आपको पता भी नही चलता और आप मर भी जाते है।यह जीवन के मृत्यु का पक्ष है तो जीवन का पक्ष वह यह है कि आप रोज-रोज जीये।जीते हुए मरें जैसे कुछ गांधी की तरह मर जायँ।उस तरह मरे कि लोंगो के लिए कुछ कर के मरे।मरना तो सबको है आज नही तो कल।तो हम रोज-रोज जी कर निर्भय होकर क्यो न मरे?भय में भी मरना है?निर्भय में भी मरना है?तो निश्चित कीजिये कैसे मरना है?जब आप किसी के सामने हाँथ फैलाते है मरने को तो आप उसी समय ही मर जाते है।जो आदमी जितना ही मरता है उतनी ही प्रचण्डता से वह जीता भी है।क्रिया -प्रतिक्रिया ही जीवन है।मृत्यु शरीर का स्थगन है।जितने ग्रन्थ लिखे गए है वह जीवन की जीवंतता से मृत्यु की भयावहता के बीच भोगी गयी त्रासदी में लिखे गए है।जीवन की जीवंतता लोकमंगल से जुड़ी है तो मृत्यु की भयावहता आस के अभाव से जुड़ी है।जीवन मे आस के दिये को जलाए रखिये रोज-रोज मरिये जिंदा रहने के लिए।यही जीवन है।इतने संवेदनशील न हो जाय कि आप और हम आत्महंता न हो जाएं।जैसे वशिष्ठ नारायण सिंह जिंदा रहे।बस्तुतः वे मर तो उसी दिन गये थे जिस दिन उनके गणित ने उनको मार दिया था।यह जीवन उपयोगिता व ह्रास के नियम पर नही चलता यह जीवन जीवन की जीवंतता से चलता है जैसे महाराणा प्रताप का जीवन था,जोखिम में भी साहस रख्खे,लगातार जीयें उन असंख्य लोंगों को जो विरोधाभाषी जीवन की आवृत्ति में युक्त है युक्त से मुक्त ही जीवन है।ईश्वर और नियति और मानवता को यह देखना पड़ेगा कि जो वशिष्ठ नारायण सिंह थे वह नियति के मारे थे या मानवता के माननीयों ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया।यही असली भारत का वह तथाकथित मानवता से भरा समाज है जो उपयोगी अत्यापयोगी अनुपुयोगी को योगी सिद्ध करती है।नही साध सकने में हमारे सामाज की विफलता ही वशिष्ठ नारायण सिंह को वह वशिष्ठ नारायण बनाता है।जिसकी कोई शिष्टता नही है यही जो नही है यही मृत्यु है नही तो जीवन आनंद ही आनंद ही है इस तरह एक गतितज्ञ आनंद को प्राप्त हो गया।यहाँ मृत्यु हार गई नियति भी उनका कुछ न विगाड़ सकी जीवन जीता वह मृत्यु वशिष्ठ नारायण सिंह से हार गई।नियति भी उनकी परीक्षा में अनुत्तीर्ण ही रही।उनकी अजर अमर आत्मा को प्रणाम
आप सभी का अभिवादन

Thursday, August 1, 2019

दुआर -दलान और ड्राइंग रूम

उन्नीस का पहाड़ा आज तक नही याद हो सका गुणा -गणित में कमजोर,कितने कीचड़ों,बीहड़ो,से दो चार होते गांव के मेड से ना जाने कहाँ - कहाँ भटकते-भटकते जीवन के रास्ते पर चल ही रहा था,हर रास्ते पर कुछ दूर चलते चौराहे मिल जाते थे न कोई लक्ष्य था न कोई मंजिल ही थी,इसी बीच कुछ ने इस दुनियां से ही विदा ले ली।खैर यात्रा का प्रारम्भ होगा तो समाप्ति भी होगी यह सबके साथ होता चला आया है सो कोई नई बात नही है।कुछ लोंगों का समय उकड़ूँ वैठा था तो कुछ अर्जुन की तरह मछली का आंख देख स्वयम्बर भी रचा लिये।तो कुछ सूत पुत्र हो कर्ण हो गए।सबका चयन अपना -अपना था।कुछ ने रति का साथ नही छोड़ा तो कुछ के लिए रति भष्मीभूत काम को पुनर्जीवित करने के यत्न में जुटे थे,कुछ को शिखंडी होना पड़ा तो कुछ जन्मजात थे,रूप और यौवन से मत्त मेनका ने विश्वामित्र को तीसरे जगत के निर्माण से रोका था।कुछ पुत्र इतने आज्ञाकारी थे कि उन्होंने अपना यौवन ही अपने पिता को दे कर संतुष्टि पाई और पिता रंगमहल में अपने बच्चे को जीर्ण होते देख यौवन की मादकता से ऊब कर यौवन लौटाया था।अंततः यथार्थ को भी दया आ गई थी।समय के चौराहों ने कितनों के चेतन -अचेतन को प्रभावित किया था।चेतन-अचेतन की वह अंधी दौड़ जो कभी स्कूल में खेल-खेल में खेले थे।अब खुली आँखों से अंधी दौड़ की तैयारी हो ही रही थी कि किसी ने आंख की पट्टी को खोला था।अब बाधारहित दौड़ की बारी थी सो आंख की पट्टी खोल दी गयी थी।इस भाग दौड़ में कुछ ने नंगी आखों की दौड़ लगाई तो तो कुछ ने गांधारी की तरह आंख पर पट्टी बांध ली।स्त्रीलिंग,पुलिंग,उभयलिंगीयों के व्याकरण को ठीक से समझ भी नही पाया था पंडीजी ने तत्सम,तद्भव,उपमा,अविधा,लक्षणा,व्यंजना,तक पढ़ाते-पढ़ाते कब रस की निष्पत्ति हो गईं यह कहाँ पता चलता है।अभी तो पालने के पूत की तरह कुछ हाथ-पैर मारता कुछ दूर ही चला था कि किसी ने जोर से आवाज लगाया क्या करते हो भाई,कमसे कम वह ब्रूटस तो नही था।कालीदास की तरह पेड़ काटते काटते एक ब्रह्म दो हो गया दो का एक ब्रह्म कब हो गया यह ध्यान ही न रहा।यह सब दुआर को छोड़ने का नतीजा था।जब आदमी अपना दुआर छोड़ता है तो ठीक दूसरे दुआर के कुत्ते जैसा हाल होता है।इसकी अलग त्रासदी है तो मजे भी अलग हैं।दूसरे दुआर के कुत्तों से साहचर्य बढ़ना।साहचर्य और सौहार्द को खोजता निकलता अभी आगे ही बढ़ा था कि अखाड़े के पहलवान ऐसी लंगी मारी की चारो खाने चित्त हो गया।अखाड़े में लंगी की वेईमानी पुरष्कृत हो चुकी थी।हारे हुए जुवारी की तरह सर को नीचे झुकाए दुनियां के सर्कस में जोकर हो गया।भूमिकाओं और भागिमाओं का जीवन मे कितना महत्व होता है यह समझते समझते इतनी देर हो गयी थी जैसे अंग्रेजी का ट्रांसलेशन के पाठ को पढ़ाते हुए पंडीजी ने मुझे पूछा था कि मेरे आने से पहले गाड़ी छूट चुकी थी और मैं उसका अंग्रेजी में अनुवाद न कर पाया था।जीवन मे अनुवाद न करने की गलती से मौलश्री की छाया छुटी और किसी का सैल्यूट आजीवन किताबों में बंद हो गया।जन्म के समय पाया कवच कुंडल कितने दिन काम आता।दया से दैन्य होता कब किसको क्या दे दिया ?कब किसने कितना लिया ? यह कहां कोई भूलता है।उधार की नांव पर सवार अभी पानी की धार को देख ही रहा था कि हवा पछुवाँ वह गयी,मल्लाह अभी नांव की कुंडी को सीधा कर ही रहा था कि हवा के ववण्डर ने नांव के पाल को ही उड़ा ले के चल पड़ी।एकोहम द्वितियों नास्ति की सारी परिभाषा ही बदल गयी।राम नाम सत्य है कहते -कहते नांव किनारे चुपचाप खडा हो यात्रियों की उतरने की प्रतीक्षा ही कर रहा था किसी ने पीछे से आवाज लगाई क्या करते हो भाई?मुझे ठेलते वह आगे बढ गया।अभी वो आगे बढ़कर पूछ ही रहा था कि कितनी नावों में कितनी बार ?घाट-घाट का पानी कोस कोस की भाषा को अभी कोस ही रहा था तब तक पैर के अगूंठे में उडुक लग चुका था खून से लतफत अंगूठे के नाखून को जोर से आंख मूँदते हुए खिंच ही रहा था कि किसी ने शवासन की मुद्रा बताई और यह भी बताया कि जीवन के लिए यह मुफीद होता है।इसी मुफीद दवा को हांथ में लिए -लिए साहित्य हो गया।आदिकाल,मध्यकाल,आधुनिक काल से होता हुआ प्लेटो से कार्ल मार्क्स हो गया इधर कुछ प्रेमचंद और गोर्की बनने की तैयारी चल ही रही थी कि छायावाद और अंधायुग शुरू हो चुका था।नॉका विहार कहा कर पाया था कि कामायनी ने सारे सर्गों की याद दिला दी थी।इसी सर्गो में विचरण करते राम की शक्तिपूजा की याद हो आई थी।रामचन्द्र शुक्ल की तरह टी.एस.इलियट को अभी कहा पढ़ पाया था तब तक भाषावैज्ञानिकों की टुकड़ी शंखनाद करते हुए स्नायु तंत्र पर ही टूट पड़े थे।अब उन्हें शरीर से कोई खतरा न था शब्दों को ढाल बनाये तलवारें भांज ही रहे थे तब तक कलिकाल का प्रभाव उनके धर दस्तक दे चुका था और लिखा जा रहा था ''अंधेर नगरी चौपट राजा।टका से भाजी टका सेर खाझा।।हा खाझा से ननिहाल की याद आ आई जहां की सीता जी थी वही मेरा ननिहाल भी है।सो उनकी त्रासदी को मैं कैसे भूल सकता था,प्राक्कथन में दोहराता बुदबुदाता रावण को अट्ट -सट बोलता,मर्यादा को कैसे तोड़ता?प्रश्नवाचक चिन्हों के बीच समय वक्र हो चला था,1857 में मंगल पांडे ने जो गोली मारी की धुंआ आज तक उठा ही रह गया,नव्वे बर्षों के अथक परिश्रम के बाद राम राज्य आ ही गया था।1947 में झंडा फहराया गया था। ऐसा किताबों में पढ़ा था,संविधान लिख उठा था।हम भारत के लोग ही प्रस्तावक व प्रस्तावना थे इसमे न जाने कब कौन प्रस्तावक बन बैठा कुछ याद नही।शक्तियों के विभाजन में कब कौन शक्तिशाली होता रहा पता ही न चला,नून,तेल,लकड़ी,में कहाँ कुछ बुझाता है भाई ।

Tuesday, July 30, 2019

बोध 1

बोध 1
आप सब मे ऊर्जा का अजश्र स्त्रोत है,क्योंकि चेतना अपने आप मे पूर्ण है,पूर्ण से पूर्ण को अगर निकाला जाएगा तो वह पूर्ण ही बचेगा,हां यह बात अलग है आपमें जिस ऊर्जा का संचरण हो रहा है उसका विस्फोट आप ही कर रहे है या यह वह है,जो आपके अन्तःक्रियाओं के परिणाम है?या प्रतिक्रिया स्वरूप आप एक अभिनव,सकरात्मक ऊर्जा का निर्माण करते चल रहै है?यहां यह ध्यातव्य हो कि जो भी सकरात्मकता एवम नाकारत्मकता है वह हमारे-आपके द्वारा विभाजित रेखा है जिसके इस पार से उस पार तक पूरा जगत है।हम उसी जगत की बात कर रहे है जहां प्रतिस्पर्धा,द्वेष,ईर्ष्या,है तो ठीक इसके विपरीत करुणा,दया,ममता का समानांतर अजस्र स्त्रोत भी है जो अपनी स्वाभाविता में गतिशील है।बस्तुतः ये जगत के वे उत्पाद है जिसके रचयिता व संघारक हमीं आप है । हमने ही जीवन को जटिल-सरल किया हुआ है।जटिलता जगत का गुण नही।जब आप जगत को संवेदनशील हो देखते है तो जो दृष्टि उभरती है वह आपकी हमारी एक जैसी ही होती है क्योंकि हमारा जीव विज्ञान,रसायन विज्ञान,भौतिक विज्ञान, मानव विज्ञान,साहित्य एक ही है विश्व के जितने ज्ञान की विधाएं है सब एक जैसी ही है अतः हमारा सबका आभ्यांतरिक जगत एक जैसा ही है।सामाजिक परिवेश,परिवारिक परिवेश,सांस्कृतिक परिवेश हमारी निर्लिप्त चेतना में संलिप्तता लाते है यह संलिप्तता ही निर्लिप्तता से पृथक करती है यह कभी भाषा के रूप में,कभी विचारों के रूप में पृथक -पृथक हो कर पूर्वाग्रहों आग्रहों का निर्माण कराते है।अचेतन मन इन पूर्वाग्रहों एवम आग्रहों की अत्यंत झीनी विभाजक रेखा को देख नही पाता फिर या तो वह आग्रही हो जाता है या वह पूर्वाग्रही हो जाता है।आइए चेतना के पूर्वाग्रह और उसके आग्रह को देखते है।एक पारिवारिक इकाई के रूप में जब हमारे ऊपर विचारों की श्रृंखला को संप्रेषित किया जाता है तब हम नही जानते की वह जीवन का आग्रह है या हमारे अंदर पूर्वाग्रहों की एक लंबी श्रृंखला बनाई जा रही है।हम उसी भांति जीवन को आचरित करना शुरू कर देते है।नदियों को प्रणाम,धरती को प्रणाम बृक्षों को प्रणाम चराचर जगत को प्रणाम करते है जिससे आवश्यक रूप से बिनीत भाव उपजता है और बिनीत भाव से हम अपने आंतरिक जगत के सौंदर्य को बाह्य जगत में देखना शुरू कर देते है तब वह हमारे धार्मिक,रीति,रिवाजों की अहम अभिव्यक्ति होती है।व्यक्तिगत सौंदर्य का हम जब विस्तार करते है वह वैभिन्नईक समाजों से होता हुआ गोचर होता है,ज्यों ही इसको पसारना शुरू करते है तत्क्षण अहमतियों- सहमतियों का जन्म शुरू हो जाता है सारा सौहार्द बोध ग्रसित हो अपनी समस्त ऊर्जा को या तो असहमतियों को समहत करने में या सहमतियों की युक्तिसंगतता देखने मे क्षरित हो जाता है यही से भगौलिक वटवारा,संप्रभुता,युद्ध,जैसी स्थितियां बननी शुरू हो जाती है,और हम विरोधाभाषी हो एक चेहरे में कई चेहरे लगाना शुरू कर देते है और जगत के सौंदर्य से बंचित हो जाते है यह सौंदर्य की त्यक्तता हमे रिक्त करती चलती है और हम एकांगी होना या उसके प्रतिपादक या अग्रदूत होने की अनावश्यक प्रतिस्पर्धा के पात्र होना शुरू करते है यह हमारा आग्रह भी होता है और पूर्वाग्रह भी।सहमति और सहजता से च्युत तब हम अधिनायक होते है तब हमें रंगों में भेद दिखाई देने लगता है तब कोई कुरुप होता है तब कोई सुदर्शन होता है।तब सभी पर्यायवाची न होकर विलोम हो जाते है । हमने जितने अनुलोम विलोम बनाये है हम उसी अनुलोम- विलोम में पूरा जीवन खपा देते है और यही से हमारे बोध का क्षरण आरम्भ होता है अतः इन उच्चावच्चों में यह देखना होगा कि सम्यक का संकुल किधर है ।

दुआर - दलान और ड्राइंग रूम

दुआर - दलान और ड्राइंग रूम
मैं अपने पिताजी के घुटने के बराबर ही था पर उनके जैसा बनने,बड़ा हो जाना चाहता था अब मेरे चाहने से पूरी पृथ्वी अपनी कक्षा में पचास वर्ष एक ही बार मे घूम तो नही जाती पर मैं चाहता था कि वह घूम जाय और मैं पिताजी जैसा बन जाऊं,पर ऐसा होता कहाँ है ? से अनिभिज्ञ अपने बड़े होने की प्रतीक्षा करता रहता,अन्य भाई बहन जिनके हाथ पैर लंबे होते जाहिर है उनका कपड़ा भी बड़ा होता था । सबके सब आदेश की मुद्रा में मुझे अनुशासन का पाठ पढ़ाते बड़े हो रहे थे और मैं आज्ञापालक की भूमिका में विनम्र रहता क्योंकि थप्पड़ से चोट बहुत तेज लगती यह बात अलग है कि जब मैं फुक्कारे मार जोर - जोर से रोता मेरी बड़ी बहन जिसने एकाध तप्पड़ रसीद किया होता था वे गुड़ भी खिलाती थी जिसको माँ न जाने कहाँ - कहां रखती थी । उसका डिब्बा कभी खाली नही रहता था,मुझे उस डिब्बे की ज्यों ही महक लगती उसका कुछ गुड़ उदरस्थ हो गया रहता सो स्थान बदलती रहती मैं अपना मन बदलता रहता वह छिपाती और मैं खोजता रहता कभी कभी मुझे लगता था कि वह छिपाती ही इसीलिए थी मैं खोज लूँ । लुका छिपी के इस खेल मैं लगभग पारंगत था,इस विशिष्ट कौशल का विकास उसकी सदाशयता ही थी दांत पिसती,डांटती वह कब बूढ़ी हो गयी और मैं युवा इसका पता ही न चला,पर उसकी हनक के हुंकार से मैं आजीवन सहमा रहा कभी हिम्मत न पड़ी की उसके सामने तेज से कुछ बोल पाऊं । उसके स्वर की कडुआहट में उतना ही गुड़ रहता था जितना कि उसके प्यार में,जिसको मैं कभी उसकी गोद मे बैठ उसके दूध पीने के लिए नाटक करता, यह नाटक इसलिए भी करता क्योंकि उसकी गोद मे जब भी मैं होता आँचल से मेरा सिर ढ़ंक कर दूध पिलाती और मेरे सर को सहलाये जाती अपने जन्धे को बार बार फैलाती की मैं उसमे समा जाऊं और मैं जगह घेरता जाता आकार के अनुरूप उसकी गोद में भर जाता था यह सिलसिला कभी पाँच मिनट का होता या मैं छोड़ता ही न था । कंठ में जो भी बूंद गए उसने इस शरीर मे इतना बड़ा घर बनाया की मैं आज तक निवृत्त न हो पाया । ऐसा नही है कि मैं निवृत्त होना चाहता हूं क्योंकि उसकी स्मृतियों से निवृत्त होना मेरे अस्तित्व से निवृत्ति है अतः वह मुझमे है और मैं उसमे हूँ । अब पिता जी !! मेरे पिताजी की कद काठी सामान्य थी उनके साथ जानवरों को चारा ले आने जाते समय मैं उनके कदमों को देखता जूते की तलवे की छाप वरसात के दिनों में स्पस्ट दिखयी पड़ जाता था उनके जूते के तलवे की लकीरों से जो बोध उपजा वे इस पृथ्वी के सम्राट से कम न थे और मैं  स्वयम्भू राजकुमार । वे अक्सर राजनीतिक धार्मिक दार्शनिक व्यख्या किया करते थे जबकि वे अपने जीवन मे कम पढ़ने को लेकर मर्माहत भी रहते थे । शायद यह मर्म ही रहा होगा कि वे महाराज दशरथ न बन पाए न ही मैं राम,लक्ष्मण,भरत, शत्रुघ्न्, वे जुलाई 1924 में पैदा  हुए थे,स्वतंत्रता संघर्ष भी देखा था,वे घोषित स्वतंत्रता सेनानी तो नही थे लेकिन इस मातृभूमि के सच्चे भक्त थे,इस देशभक्ति का जीता जागता उदाहरण मैं बना तमाम प्रकार की संपत्तियों से बंचित उत्तराधिकारी के रूप में मुझे वैसुधैव कुटुम्बकम ही मिला और अब तक मैं उनकी इस धरोहर को सुरक्षित रखा हूँ ।
क्रमशः

Saturday, July 27, 2019

ठूँठ का ऊँट

ठूँठ का ऊँट
बहुत कुछ आपको पढ़ना नही होता,वह तो आपके अन्तर्जगत में समाहित है,हां कभी -कभी उस पट को झांक अवश्य लिया करे ,जहां तक आपने देखा है,उसके उस पार का जगत भी ऐसा ही है,जैसा आपने देख छोड़ा है,जब आप किसी सजीव को देख रहे होते है,उसके लिए आपको कोई साहित्य या पुस्तक पढ़नी नही पड़ती,आपके अंदर का साहित्य,इतिहास,अर्थशात्र,दर्शनशात्र,भूगोल,भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान,जीव विज्ञान,मानव विज्ञान, संस्कार,धृणा,प्रेम,अनुकूल - प्रतिकूल अक्षरों के रूप में वाक्य के समूहों में उद्घाटित होने लगते हैं।आपके अंदर का तमस - उमस के साथ वाहर निकलने लगता है और आप उसे व्याकरण के धागे में पिरोते हुए किसी के गर्दन में उस शब्दों की माला को डालकर प्रतीत की अनुभूति को प्राप्त होते है,हां यहां यह ध्यान रखना होगा कि प्रतीति का भी संवेदी सूचकांक होता है बस यहीं-कहीं,किसी को प्रतीति में संभावना दिखती है तो किसी में वह चक्रवात की तरह आलोड़न कर देती है या प्रतीति अपना अर्थ ही खो देती है । खैर संवेदना कोई ठोस बस्तु नही वह द्रव होता है जो स्वयम में गतिशलता लिए कभी सीधे तो कभी चौतरफा पानी के बेग को  धरती में फटे दरार को तृप्त कर देती है,यह प्रक्रिया कभी मद्धिम तो कभी-कभी तीव्र होती ही रहती है । मद्धिम और तीव्र होते उसके गुण रैखिक नही होते वे छैतिज भी नही होते है।रैखिक और छैतिज के बीच मे आप कभी जीवन के चतुष्कोण बनाते व्यास को अपने प्रक्रार से मापना शुरू कर देते है क्योंकि इनकोणों में ही या तो आप व्यस्त है याआपके द्वारा खींची गई रेखा आपकी भंगिमा है तो भागिमाओं को पढ़िए जो आपके मूल उतपत्ति में है जो आपको विश्राम देती है,विश्राम से गोचर होती भंगिमाओं को आप उसके इर्द - गिर्द ही देख पाएंगे,क्योंकि जहां से आप इन चीजों को देख रहे है  वह निराधार नही वह आपके अस्तित्व के आधार होते है,तो जिसका जो आधार हो उसका वह ही निष्कर्ष भी होता है तो निष्कर्णात्मकता की दृष्टि भी  वायवीय ही जानिए, वायवीय होने के अपने खतरे है तो अवायवीय के भी अपने खतरे कम नही हैं अतः वायवीय होते चित्त को देखिए और यह भी देखिए कि वह ज्यामितीय कोण बना पाते है या नही ? अगर कोई आकृति नही बन पाती है तो भिन्न भिन्न कोणों के बीच स्वयम को देखें,आप यहीं कहीं किसी व्यास या कोण के आधार को लम्बवत या  दंडवत करते देखे जाएंगे ।