Sunday, June 12, 2016

प्रिय रविश जी,एन०डी० टीवी के वाचक एवं प्रिय धर्मेन्द्र जी,भारतीय पुलिस सेवा






प्रिय रविश जी एवं प्रिय धर्मेन्द्र जी,-धर्मेद्र जी आपके पत्र का प्रेषण,एक प्रतिउत्तर है, रविश जी कार्यपालिका और विधायिका दोनों के गठजोड़ का विश्लेषण कर रहे है,उनका विश्लेषण कई मायनों में सही भी हो सकता है,किन्तु संसोधनों के साथ,मुझे संसोधनों में यह लगता है,कि एक के पास सब कुछ कहने की स्वतंत्रता है विधि द्वारा स्थापित सीमाओं के साथ,तो दूसरे के साथ भी यह समस्या है,परिस्थितिया एक सी है,एक सिर्फ शब्दों से प्रहार करता हुआ दिखता है, तो दूसरा उन प्रक्षेपित प्रहारों को ठीक उसी दिसा में मोड़ता है,जिस दिशा से वे शब्द आये थे इन कलाबाजियों के मसीहागीरी में मै अपने शब्दों की कुछ कलाबाजी मै भी कर रहा हूँ,आप दोनों उस व्यवस्था को कोष रहे है,जिसमे आप और हम जी रहे है,हम सिर्फ संस्थाओं के प्रतिनिधि के रूप में शब्दों को अपने द्वारा बनायी हुयी प्रत्यंचा से प्रक्षेपित कर रहे है,यह प्रत्यंचा बनायी ही क्यूं ? यह प्रत्यंचा इसलिए बनाई कि इस शस्त्र से हमारा पेट भरे,भरे हुए पेट से निकले शब्द बाण इसी तरह से निकलते है, एवं इसी तरह से प्रति उत्तरित होतें है,साहित्य के लालित्य में खो जाने वाले यह शब्द पत्र ही मूल समस्या है,हम अच्छे या तुम अच्छे,इस क्रिया में जो नहीं हो पा रहा वह यह है, कि हम और तुम से बाहर निकलते हुए, हमने कभी सोचा की यह शब्द किन तक संप्रेषित हो रहे है ? और किसके लिए हो रहे है,शायद नहीं, शायद कारण यह है कि रविश जी गाँव को छोड़ अब दिल्ली में आ चुके है,अब वे दिल्ली के किसी शानदार फलैट से चमचमाती रोशनी से नहाये पूरी दिल्ली देख रहे है जो भारत है,और वहीँ से शाश्वत विश्लेषण की प्रक्रिया में संधान की मुद्रा में है,तो आप अभी एसी से निकलते हुए बर्दी पहने हुए नीली बत्ती से सवार हो अभी घटना क्रम को देख आये संवेदना के त्रास से आहत है,दोनों की स्थितिया बदल चूँकि है,आप जब पड़ रहे थे तो मुक्तिबोध को पढ़ना आपकी मज़बूरी थी, क्योंकि वही मुक्तिबोध आपके भविष्य के सम्वाहक थे,मुक्तिबोध की आवश्यकता भी यही तक थी कि आप उस मानसिकता में जीते हुए आप मुक्तिबोध को कैसे छोड़े,आपने मुक्तिबोध से मुक्ति पा कर नीली बत्ती पा ली, और रविश जी ने उस गाँव की अनुभूति को छोड़ उन अनुभूतिक शब्दों को कैश कराने लगे,अगर रविश जी उसी गाँव की स्टूडियो से बोलते उनकी आवाज न आप सुनते न हम सुनते,लगभग पूरे भारत की यही स्थिति है,मै भी आप दोनों की कतार में खडा वह व्यक्ति हूँ जो अभी तक अपने शब्दों को कैश नहीं सका है, अक्षम है,अंदर से मै भी चाहता था, कि आप दोनों की भूमिका मिले व्यक्तित्व को दोष दें,या परिस्थतियों के आयोजन में त्रुटी,परिस्थितिया आप जैसी नहीं बना पाया, या मुझे रास नहीं आया?अब नहीं मिला तो आप अपने पास दोनों तर्क रख सकते है..१९४७ से पहले के लोंगों का भारत और उसके बाद के भारत में बहुत अंतर आ गया है,ध्यान रखे यह मै लखनऊ से देख रहा हूँ,हम शब्दों के नेपथ्य में जो है,वह होकर जब सोचेंगे तब वह किसी संस्था का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे होंगे, तब हम भारत के लोंगों का प्रतिनिधायन कर रहे होंगे,रविश जी आपने अपने पत्र में यह स्वीकारा है की आप रट्टा मारने कम दिल्चपसी रखते थे,सही तो यह आप रट्टा मार ही नहीं सकते थे,और भाई धर्मेद्र जी,साहित्य की साधना की जो आयोजित साधना थी कि और परिणाम स्वरूप नीली बत्ती पा ली,दिल्ली में इनका सिविल सर्विस आफिसर्स इन्सीटयूट है,कभी जाय, देखे कितना भव्य बना है, कितना सुखद है, मैंने देखा है, यह सौभाग्य बस ही प्राप्त हो पाया, मेरे एक दूर के रेस्त्तेदार है जो इनकी श्रेणी में आते थे,शायद वहां इसलिए लिवा जाते थे आप अपनी औकात का मापन और परिक्षण करें ?मुझे रात से क्या शनक सबार है की बीना प्रतिउत्तर के सांस लेना मुश्किल है,आप दोनों लोग हमें अपनी औकात न दिखाए,मै एक सुधारक को खोज रहा हूँ, एक इमानदार व्यक्ति को खोज रहा हूँ, जिस दिन वह मिल जाएगा तब हम भारत के लोंग अपनी प्रत्यंचा से शब्द बाण नहीं कर्मरत भारत देखेंगे,हम भी अब्दुल कलाम की तरह सपने देख रहे है और उसे पाने की प्रक्रिया में संधानरत है,एक कविता जिसको मैंने 1990 में लिखी थी,जो प्रासंगित दिखती है आज के परिपेक्ष्य में 

''विचारों का गहन अन्धेरा! 
 बुद्धिबाद का अंत 
 सत्य अपना अर्थ खोजता 
 तिलष्मी का खोह 
 व्यक्ति का व्यामोह 
 अनुत्रित प्रश्न 
 जो समय के लबादे में खो गया है,,   


भवदीय 
रवि शंकर पाण्डेय

1 comment:

  1. सुन्दर विश्लेषण।

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